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पुलिस ने बोला झूठ, लखनऊ में हुआ था गैंगरेप

विवेक त्रिपाठी/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 28 Jul 2014 10:34 AM IST
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mohanlalganj gangrape case
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मोहनलालगंज गैंगरेप मामले में पुलिस की कहानी पूरी तरह झूठी साबित हो चुकी है। फॉरेंसिक जांच में दरिंदगी की शिकार महिला की हत्या गैंगरेप के बाद ही की गई थी।



महिला के निजी अंगों और नाखूनों के सैंपल की फॉरेंसिक जांच ने इस मामले में केवल सिक्योरिटी गार्ड राम सेवक के शामिल होने की पुलिस की थ्योरी को झूठ साबित कर दिया है।
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डीआईजी नवनीत सिकेरा ने वारदात में एक से अधिक व्यक्ति के शामिल होने की बात को स्वीकार करते हुए कहा कि नाखूनों के सैंपल में रामसेवक यादव की प्रोफाइल तो स्पष्ट हो गई लेकिन दूसरों का पता नहीं चल पा रहा है।
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रामसेवक के साथ और कौन लोग थे, इसकी पड़ताल कराई जाने की बात उन्होंने कबूल की है।

नाखूनों के सैंपल से हुआ यह खुलासा

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बलसिंहखेड़ा के प्राथमिक विद्यालय में बीते बृहस्पतिवार की सुबह महिला का खून से लथपथ निर्वस्त्र शव मिला था।

घटनास्थल देखकर महिला से गैंगरेप की आशंका जताई जा रही थी। पोस्टमार्टम में भी महिला के निजी अंगों के साथ ही मुंह से श्वाब और नाखूनों से सैंपल लिए गए थे।

फॉरेंसिक सूत्रों ने बताया कि मृतका के दो सबसे महत्वपूर्ण सैंपल की जांच करके रिपोर्ट एसएसपी प्रवीण कुमार को सौंप दी गई है। सूत्र बताते हैं कि मृतका के निजी अंगों से जो श्राव का सैंपल लिया गया था, उसका मिलान रामसेवक के श्राव से हो गया है।

अन्य आरोपियों की हो रही पड़ताल

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साथ ही नाखूनों के सैंपल की जांच में ‘मिक्स्ड प्रोफाइल’ आया है। यानि महिला को घर से बुलाकर लाने और रेप के बाद हत्या करने की जघन्य वारदात में रामसेवक अकेला नहीं था।

मृतका के नाखूनों से रामसेवक के अलावा अन्य लोगों के निशान भी मिले हैं।

डीआईजी का कहना है कि शुरुआती पड़ताल और इलेक्ट्रानिक सर्विलांस में सिर्फ रामसेवक का नाम आया था जिसे गिरफ्तार कर लिया गया। हो सकता है कि उसके साथ और लोग भी हों। डीआईजी ने कहा कि अन्य आरोपियों के बारे में पड़ताल कराई जाएगी।

अनट्रेंड था वीडियोग्राफर

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मोहनलालगंज कांड की पीड़ित महिला के पोस्टमार्टम की जिस हैंडीकैम से वीडियोग्राफी की जा रही थी, उसमें फ्लैश लाइट नहीं लगाई गई थी। इससे पर्याप्त रोशनी का अभाव हो गया।

वीडियोग्राफी करने वाला भी अनट्रेंड था। किस पार्ट पर फोकस करना है। कैमरे का एंगल क्या होना चाहिए इसकी वीडियोग्राफर को कोई जानकारी ही नहीं थी।

इन्हीं कमियों के चलते पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी सवालों के घेरे में है। सूत्रों के अनुसार इन्हीं वजहों से वीडियो की क्वालिटी खराब हुई है और जांच में इतना वक्त लग रहा है।

विशेषज्ञों के अनुसार पोस्टमार्टम के वक्त पर्याप्त रोशनी और ट्रेंड वीडियोग्राफर होता तो किडनी के सच से पर्दा उठने में इतना वक्त नहीं लगता।

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