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सुना है क्या: भविष्य सुधारने की रणनीति, चार्ज की चाहत; 'अचानक खुल गए ज्ञान चक्षु' की कहानी

अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: Akash Dwivedi Updated Sat, 06 Jun 2026 02:11 PM IST
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सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...

Have you heard? A strategy to improve the future, a desire for a position of authority; the story of the 'sudd
सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'भविष्य सुधारने की रणनीति' की कहानी। इसके अलावा 'चार्ज की चाहत' और 'अचानक खुल गए ज्ञान चक्षु' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

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भविष्य सुधारने की रणनीति

प्रदेश के एक चिकित्सा संस्थान में इन दिनों कार्रवाई का दौर शुरू हो गया है। सत्ता के गलियारे में चर्चा है कि संस्थान प्रमुख अपनी छवि सुधारने में लगे हैं। उनके सिपहसलार भी यही प्रचारित कर रहे हैं लेकिन विभाग में दूसरी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। 

लोगों का कहना है कि इससे भविष्य नहीं सुधरेगा क्योंकि यह नेतृत्व क्षमता की विफलता है। इसी तरह का भ्रष्टाचार रोकने के लिए अनुभवी मुखिया रखा जाता है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि पूरे मामले में मुखिया पर भी छींटे पड़ने लगे थे। यही वजह है कि अब तक उनके दरबार में रहने वाले दरवाजे से बाहर निकल रहे हैं।

 

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चार्ज की चाहत

जैसे-जैसे चुनावी सीजन परवान चढ़ रहा है, वैसे-वैसे चार्ज लेने की चाहत वालों की बेचैनी बढ़ती जा रही है। खास तौर पर ब्यूरोक्रेसी में असरदार पदों पर बैठने के लिए जोड़-तोड़ का सिलसिला जोरों पर है। ऐसे ही ओहदेदार कुर्सी पर बैठे एक साहब ज्यादा जिम्मेदारी लेने के लिए मन की बात कह चुके हैं लेकिन अभी तक कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला है। सुना है कि अब वह अपना दुखड़ा रोने के लिए नया कंधा तलाश रहे हैं। वैसे भी अब उनके मातहत उनका ज्यादा लोड नहीं ले रहे हैं। यह भी उनके दुख का बड़ा कारण है।

 

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अचानक खुल गए ज्ञान चक्षु

प्रदेश के एक प्रमुख विवि में एक महोदय खुद को बड़े साहब से कम मानने को तैयार ही नहीं थे। इसमें उन्हें आर्थिक झटका भी लगा और सार्वजनिक लानत-मनानत भी। महोदय ने क्रांति कर धरना प्रदर्शन भी किया।वह दांव भी उल्टा पड़ा। पता चला है कि बड़े साहब को फिर मौका मिलते ही, उनके ज्ञान चक्षु खुल गए हैं। वह बड़े सामान्य से कामकाज करने लगे हैं। इसका मूल कारण विवि में हुई बड़ी बैठक भी बताई जा रही है।

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