हाईकोर्ट का सख्त आदेश, रास्तों पर बने अवैध धार्मिक स्थल हटाओ
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हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने प्रदेश सरकार को सख्त आदेश दिया है कि सड़कों के किनारे, गलियों में, हाईवे पर, चौराहों पर अतिक्रमण करके जहां भी धार्मिक स्थल बनाए गए हैं, उन सभी को तुरंत हटाया जाए।
एक याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि 1 जनवरी 2011 या उसके बाद अतिक्रमण करके बने सभी तरह के धर्मस्थलों को तुरंत तोड़ा जाए। वहीं, इससे पहले बने धर्मस्थलों को शिफ्ट करने का आदेश दिया है। मुख्य सचिव को इसकी अनुपालना रिपोर्ट दो महीने में कोर्ट को देनी होगी।
अदालत ने मुख्य सचिव से साफ कहा कि वे सभी जिलों के डीएम, एसएसपी, एसपी और सड़कों के मेंटीनेंस से जुड़े अफसरों को इस संबंध में निर्देश जारी करें। अगर निर्देश के अनुसार कार्रवाई नहीं हुई तो इसे कोर्ट की नाफरमानी और आपराधिक अवमानना माना जाएगा।
राजधानी के पारा पुलिस स्टेशन के निकट दाउद खेड़ा के 19 नागरिकों की याचिका पर जस्टिस सुधीर अग्रवाल व जस्टिस राकेश श्रीवास्तव ने यह आदेश दिया।
10 जून के बाद कोई अवैध धर्मस्थल बना तो अफसर होंगे जिम्मेदार
अदालत ने कहा कि 10 जून, 2016 या उसके बाद सड़कों पर अतिक्रमण कर धार्मिक स्थल न बनने पाए, इसकी जिम्मेदारी संबंधित जिलों व उपमंडलों के डीएम, उप जिलाधिकारियों, एसएसपी, एसपी, सीओ और सड़कों के प्रबंधन से जुड़े अफसरों की होगी। धर्मस्थल चाहे उन्हें जिस नाम से पुकारा जाए या जिस भी धर्म, समुदाय, संप्रदाय, जाति, पंथ, वर्ग आदि के हों, इन्हें न बनने देना संबंधित अफसरों की निजी जिम्मेदारी है।
किसी के स्वतंत्र रूप से चलने में बाधा नहीं बन सकते अवैध धर्म स्थल
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि नागरिकों को इसका मूल या कानूनी अधिकार नहीं है कि वे सार्वजनिक सड़कों या गलियों के किनारे अतिक्रमण करके निर्माण करें।
यह गैर कानूनी है और ट्रैफिक ही नहीं, पैदल चलने वालों के सामने भी बाधा बनता है। प्रत्येक नागरिक को मुक्त रूप से चलने का मूल अधिकार प्राप्त है और कुछ कानून तोड़ने वाले इसका उल्लंघन नहीं कर सकते। सरकारी अधिकारी भी इसे लेकर उदासीन नहीं बने रह सकते।
धार्मिक गतिविधियों के आयोजनों से भी न रुकने पाए ट्रैफिक
कोर्ट ने प्रदेश सरकार से कहा है कि वह एक कार्ययोजना बनाए और सुनिश्चित करे कि धार्मिक गतिविधियों की वजह से सार्वजनिक मार्गों का ट्रैफिक और नागरिकों का आवागमन प्रभावित न हो। ऐसी गतिविधियां वहीं हों जहां इनकी जगह निर्धारित की गई है या निजी जगहें हैं।
धर्म के नाम पर अतिक्रमण को रोकना ही होगा
अवैध धार्मिक स्थलों पर आदेश देते समय हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने इसे बड़ा मामला बताया। जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस राकेश श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि धर्म, आस्था, समुदाय आदि के नाम पर अतिक्रमण का यह मामला बहुत बड़ा है और हर जगह फैला हुआ है।
यह जरूरी है कि प्रदेश सरकार के अधिकारियों को इस पर प्रभावी कार्रवाई के लिए कहा जाए। हमारी नजरों में जो लोग इस तरह की बाधा बनने वाले धर्मस्थलों का निर्माण करते हैं, इनकी देखभाल या प्रबंधन करते हैं और जो इनके खिलाफ कार्रवाई करने में असफल रहते हैं, उन सभी को इन गलतियों के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने की जरूरत है।
हाईकोर्ट ने ये निर्देश दिए...
सड़कों, गलियों में न होने पाएं ऐसे निर्माण
मुख्य सचिव सभी जिलाधिकारियों, एसएसपी/एसपी और हाईवे सहित सभी तरह की सड़कों के प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों को आम निर्देश जारी करें। किसी भी तरह के धार्मिक स्थल को सार्वजनिक सड़कों, गलियों, हाईवे, पाथ-वे, साइड-वे आदि पर बनाने की अनुमति नहीं होगी।
दो महीने में हटाएं नए ढांचे
1 जनवरी 2011 या उसके बाद बने ऐसे किसी भी ढांचे को हटाया जाएगा। संबंधित जिलों के डीएम इसकी अनुपालना रिपोर्ट संबंधित विभागों के प्रमुख सचिवों और सचिवों को देंगे। इनके आधार पर प्रमुख सचिव व सचिव एक व्यापक रिपोर्ट बनाएंगे और अगले दो महीने में मुख्य सचिव को देंगे।
छह महीने में पुराने ढांचे हटाएं
1 जनवरी 2011 से पहले अतिक्रमण करके बनाए गए अवैध धार्मिक ढांचों को एक स्कीम बनाकर वहां से स्थानांतरित किया जाएगा। इसे स्थानांतरित करने के लिए छह महीने के भीतर नई निजी भूमि वह व्यक्ति देगा जिसे इस ढांचे से लाभ हो रहा है या जो इस ढांचे के प्रबंधन व देखभाल में लगा था।
ऐसा नहीं होता है तो इस ढांचे को भी छह महीने के भीतर हटा दिया जाए। इसकी अनुपालना रिपोर्ट भी उसी तरह दी जाएगी जैसी 1 जनवरी 2011 या उसके बाद बने ढांचों पर दिए निर्देशों के लिए तय की गई है।
लखनऊ के मामले में दो हफ्ते में एक्शन लें
याचिका में उठाए गए राजधानी के मामले में लखनऊ के जिलाधिकारी को निर्देश दिए वे तुरंत कदम उठाएं और दो हफ्ते में उचित कार्रवाई करके समस्या दूर करें।
मुख्य सचिव सात महीने में रिपोर्ट दें
हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से कहा है कि वह मुख्य सचिव के जरिये सात महीने में सभी निर्देशों की अनुपालना रिपोर्ट हाईकोर्ट को दें। इसके लिए 7 जनवरी 2017 की तारीख तय की गई है।
यह था मामला
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट को बताया था कि लखनऊ में उनका घर दाउद खेड़ा में आता है। उनके घर को आरडीएसओ और राजाजीपुरम से एक सार्वजनिक मार्ग जोड़ता है।
इस मार्ग पर कुछ लोगों ने अतिक्रमण करके एक धार्मिक स्थल बनाना शुरू कर दिया है। वे सरकारी जमीन पर कब्जा करना चाहते हैं और धर्मस्थल के लिए चबूतरे का निर्माण कर चुके हैं। यह चबूतरा आवाजाही में बाधा बन गया है।
याचिका के साथ इससे जुड़ी तस्वीरें भी दाखिल की गई थीं। साथ ही कहा गया कि शहरी निकाय व जिला प्रशासन को लगातार शिकायत करने के बाद भी किसी ने समस्या का समाधान नहीं किया।
याची के वकील ने दिए तर्क
याचिकाकर्ताओं के वकील ने हाईकोर्ट में तर्क रखा कि देश के आम नागरिक किसी न किसी धर्म को मानने वाले हैं। वे जब किसी धार्मिक स्थल का निर्माण होते देखते हैं तो भले ही वह उनकी असुविधा का कारण बन रहा हो, लेकिन कोई आपत्ति नहीं करते।
कुछ लोग उनके इस भोलेपन का फायदा उठाकर सार्वजनिक भूमि पर कब्जा करने लगते हैं। मंदिर, मजार, समाधि, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि सार्वजनिक मार्गों के किनारे बनाकर अतिक्रमण किया जाता है। हाईवे तक को भी नहीं छोड़ते। यह सुगम ट्रैफिक में बाधा बनता है।
अफसर भी नरम रवैया रखते हैं और कोई एक्शन नहीं लेते। यही वजह है कि हर जगह ऐसे अवैध धर्मस्थल बढ़ते ही जा रहे हैं।
सरकारी वकील ने बताई मजबूरी
सरकारी वकील ने भी हाईकोर्ट के सामने कहा कि ऐसे अवैध निर्माण को अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को देखते हुए अधिकारियों के लिए एक्शन लेना संभव नहीं हो पाता। हाईकोर्ट इस मामले में उचित निर्देश दे तो यह अवैध धर्मस्थलों को हटाने में अधिकारियों के लिए मददगार साबित होगा।