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इच्छा मृत्यु: विरोध में केंद्र, सुप्रीम कोर्ट बहस के पक्ष में

Updated Thu, 17 Jul 2014 10:27 AM IST
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supreme court wants countrywide debate on legalizing euthanasia
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सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय अवस्था वाले व्यक्ति की जीवन रक्षक प्रणाली हटाकर उसे इच्छा मृत्यु देने की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता देने के सवाल पर बुधवार को सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किए।


इस दौरान केंद्र ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि यह एक तरह की आत्महत्या है जिसकी देश में इजाजत नहीं दी जा सकती।

चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने इच्छा मृत्यु के सवाल पर विचार के लिए सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि इस मसले पर राज्यों का पक्ष भी सुना जाना चाहिए।

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अटार्नी जनरल ने क‌िया व‌िरोध

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क्योंकि सिर्फ संविधान ही नहीं बल्कि नैतिकता, धर्म और चिकित्सा विज्ञान से भी जुड़ा मसला है। अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि यदि इच्छा मृत्यु को कानूनी मान्यता दी गई तो इसका दुरुपयोग हो सकता है। यह कानूनन अपराध है।

उन्होंने कहा कि इस मसले पर विधायिका में बहस के बाद फैसला किया जाना चाहिए , यह न्यायालय के निर्णय का मामला नहीं है।

केंद्र की दलीलों का जवाब देते हुए न्यायालय ने कहा कि कानून का दुरुपयोग इच्छा मृत्यु को कानूनी दर्जा देने का आधार नहीं हो सकता है।

'इस मुद्दे पर बहस हो'

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सुनवाई के दौरान पीठ ने पूर्व सॉलिसीटर जनरल टीआर अंध्यार्जुना को इच्छा मृत्यु मामले में अदालत की मदद के लिए न्यायमित्र नियुक्त कर दिया।

इस मामले की सुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने सवाल किया कि इसका दुरुपयोग रोकने के लिए इसकी सुरक्षा के उपाय भी होने चाहिए।

पीठ ने याचिकाकर्ता से जानना चाहा कि जीवन का अंत करने के लिए सबसे कम पीड़ादायक कौन सा तरीका हो सकता है। क्योंकि दुनिया भर में इस पर बहस हो रही है। लेकिन इस बारे में किसी निष्कर्ष पर आमराय नहीं बन सकी है।

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'इस मसले पर स्पष्ट व्यवस्था दी जाए'

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इच्छा मृत्यु के विवादित मसले को शीर्षस्थ अदालत की तीन सदस्यीय पीठ ने 25 फरवरी को सुविचारित निर्णय के लिए संविधान पीठ के पास भेजा था।

पीठ ने कहा था कि न्यायालय के पहले के फैसलों में व्यक्त की गई अलग-अलग राय के मद्देनजर बहुत जरूरी है कि इस मसले पर स्पष्ट व्यवस्था दी जाए।

तब अदालत ने कहा था कि निष्क्रिय अवस्था में इच्छा मृत्यु की अनुमति देने संबंधी उसका 2011 का फैसला गलत अवधारणा पर आधारित है।

'असाध्य बीमारी से ग्रस्त व्यक्त‌ि को म‌िले अध‌िकार'

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गौरतलब है कि गैर सरकारी संगठन कामन काज की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया गया था।

इस संगठन का तर्क था कि चिकित्सकों की राय में यदि कोई व्यक्ति ऐसी असाध्य बीमारी से ग्रस्त होता है जिसमें उसके बचने की कोई संभावना नहीं है तो उसे जीवन रक्षक उपकरणों की मदद लेने से इनकार करने का अधिकार मिलना चाहिए, अन्यथा यह उसकी पीड़ा को ही लंबा खींचेगी।

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