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आगरा कथा: लोहामंडी में कभी बनते थे शाही हथियार, देश ही नहीं यूरोप से आते थे खरीदार

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Sat, 12 Dec 2020 12:19 AM IST
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Know The History Of Lohamandi Market
लोहामंडी बाजार - फोटो : अमर उजाला
लोहामंडी में कभी शाही हथियार बनाए जाते थे। ये इतने शानदार होते थे कि इनकी मांग एशिया ही नहीं, यूरोप तक  थी। यूरोप से कारोबारी इन्हें खरीदने के लिए आते थे। बात मुगल बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के शासन काल की है। 
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लोहामंडी का बाजार - फोटो : अमर उजाला
बात मुगल बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के शासन काल की है। मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच वर्ष 1576 में हल्दीघाटी का युद्ध हुआ था। अकबर की सेना के सेनापति राजा मान सिंह थे। अकबर ने उनसे कहा था कि युद्ध के बाद गढ़िया लुहारों को अपने साथ लेते आना। मान सिंह ने ऐसा ही किया। सैकड़ों की संख्या में गढ़िया लुहारों को आगरा ले आए।
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लोहामंडी - फोटो : अमर उजाला
अकबर ने उन्हें जिस स्थान पर बसाया, वह बाद में लोहामंडी कहलाया। यहां लोहे के हथियार बनाए जाते थे। इतिहासकार राज किशोर राजे ने बताया कि लोहामंडी का जिक्र मुगल दौर में आगरा आए फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने भी किया है। उसने लिखा है कि यहां बने हथियारों की बात ही कुछ और थी। ये यूरोप तक पसंद किए जाते थे।
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लोहामंडी - फोटो : अमर उजाला
अंग्रेजों के दौर में बदला काम
अंग्रेजी हुकूमत के दौरान लोहामंडी का स्वरूप बदल गया। बंदूकें आ जाने से लोहे के हथियारों की जरूरत पहले जैसी नहीं रह गई। यहां लोहे की जाली, दरांती आदि सामान बनने लगा। साथ ही और कारोबार भी शुरू हो गए। आसपास आबादी तेजी से बढ़ी।
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लोहामंडी थाना, आगरा - फोटो : अमर उजाला
आज भी लोहे के सामान की 500 दुकानें
लोहामंडी व्यापार संघ के अध्यक्ष मुकेश कुमार अग्रवाल ने बताया कि लोहामंडी में अभी भी लोहे के सामान की 500 दुकानें हैं। इनके अलावा कारखाने हैं जिनमें लोहे की कड़ाही, जाल, शटर बनाए जाते हैं। इसी से ही बाजार की पहचान है। हालांकि परचून, स्टेशनरी आदि की दुकानें भी हैं।
 
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