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Mahashivratri: बांसवाड़ा की लोढ़ी काशी में विराजते साढ़े 12 स्वयंभू शिवलिंग, करीब 1300 साल पुराना है मंदिर

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बांसवाड़ा Published by: बांसवाड़ा ब्यूरो Updated Sun, 15 Feb 2026 06:51 AM IST
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सार

 Mahashivratri: बांसवाड़ा का वनेश्वर महादेव मंदिर करीब 1300 साल पुराना है।  मंदिर का निर्माण अणाहिल्ल (वसावेल), पाटन गुजरात के राजा वनराज चावड़ा ने संवत 805 से 810 के बीच करवाया था।
 

12 and half self manifested Shivlingas reside in Lodhi Kashi of Banswara temple is 1300 years old
वनेश्वर महादेव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

राजस्थान के दक्षिणांचल में स्थित बांसवाड़ा को स्वयंभू साढ़े 12 शिवलिंगों के कारण ‘लोढ़ी काशी’ कहा जाता है। यहां स्थित सभी शिवालय श्रद्धालुओं की गहरी आस्था के केंद्र हैं। इन्हीं में प्रमुख है कागदी नदी के किनारे स्थित वनेश्वर महादेव मंदिर, जहां शिवलिंग पर गाय के खुर का चिह्न मौजूद है।
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शनिवार मध्यरात्रि से विशेष आरती का आयोजन
शहर की पूर्व दिशा में स्थित वनेश्वर शिवालय में तीन स्वयंभू शिवलिंग स्थापित हैं- वनेश्वर, धनेश्वर और नीलकंठ महादेव। मंदिर के पुजारी उमंग शर्मा के अनुसार महाशिवरात्रि और मंशाव्रत चौथ पर यहां विशाल मेला लगता है। हर साल की तरह इस साल भी महाशिवरात्रि के अवसर पर मंदिर परिसर में विशेष सजावट की गई है। शनिवार मध्यरात्रि से महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि तक विशेष आरती का आयोजन किया जाएगा।



भंवरों ने की थी मंदिर की रक्षा
मंदिर का निर्माण अणाहिल्ल (वसावेल), पाटन गुजरात के राजा वनराज चावड़ा ने संवत 805 से 810 के बीच करवाया था। किवदंती के अनुसार मध्यप्रदेश के धार के शासक ने जब बांसवाड़ा पर आक्रमण किया, तब मंदिर के पूर्व में गंगेलाव नामक स्थान पर सेना का पड़ाव था। उस समय बांसवाड़ा के तत्कालीन शासक ने भगवान वनेश्वर से रक्षा की प्रार्थना की। मान्यता है कि राजा की प्रार्थना के बाद मंदिर से भंवरों का झुंड निकला और आक्रमणकारी सेना पर टूट पड़ा। सैनिक व्याकुल हो उठे और अंत धार के शासक ने क्षमा मांगकर आक्रमण न करने का संकल्प लिया, तब जाकर भंवरे लुप्त हो गए।
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शिवलिंग पर है गाय के खुर का निशान

लोक मान्यता के अनुसार प्राचीन काल में वनेश्वर मंदिर के चारों ओर घना जंगल था। कागदी नदी के तट पर बांसों के झुरमुट थे। एक गाय प्रतिदिन स्वतः शिवलिंग पर दुग्धाभिषेक करती थी। एक दिन स्वामी को देखकर गाय भागने लगी और उसका खुर शिवलिंग पर पड़ गया। उसका निशान आज भी शिवलिंग पर देखा जा सकता है। मंदिर के समीप कागदी नदी किनारे भी ऐसा ही एक चिह्न था, जो कालांतर में जलमग्न हो गया।

दशहरे पर सवारी की परंपरा आज भी कायम
देवप्रबोधिनी एकादशी पर शहर के साढ़े 12 शिवलिंगों की परिक्रमा यात्रा वनेश्वर मंदिर से प्रारंभ होकर यहीं समाप्त होती है। रियासतकाल में दशहरे पर अंबामाता मंदिर से शोभायात्रा निकाली जाती थी, जिसमें तत्कालीन शासक भी शामिल होते थे और नीलकंठ पक्षी के दर्शन करते थे। यह परंपरा आज भी जारी है।

आजादी के बाद वस्थान विभाग के अधीन है मंदिर 
आजादी से पहले मंदिर के पुजारियों को पूजा-पाठ के खर्च के लिए उस समय के शासक की ओर से पैसा दिया जाता था। लेकिन आजादी के बाद यह मंदिर देवस्थान विभाग के अधीन कर दिया गया।


 
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