High Court : सूबे में बढ़ रहा बाल विवाह, रोकने में पुलिस-प्रशासन नाकाम
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूबे में बाल विवाह के बढ़ते मामलों पर गहरी नाराजगी जताई है। इसके लिए सीधे तौर पर पुलिस-प्रशासन को विफल बताया है। कोर्ट ने कहा कि सूबे में बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सूबे में बाल विवाह के बढ़ते मामलों पर गहरी नाराजगी जताई है। इसके लिए सीधे तौर पर पुलिस-प्रशासन को विफल बताया है। कोर्ट ने कहा कि सूबे में बाल विवाह जैसी कुप्रथाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। क्योंकि, इसे रोकने के लिए पुलिस की ओर से कोई सक्रियता नहीं दिख रही है।
इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता, न्यायमूर्ति अजय कुमार द्वितीय की खंडपीठ ने देवरिया के महुआडीहा थाना क्षेत्र में 14 वर्षीय पीड़िता के अपहरण और जबरन शादी करने के आरोप को लेकर दर्ज एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। साथ ही जांच अधिकारी को मामले की जांच बाल विवाह निषेध अधिनियम के कड़े प्रावधानों के तहत निष्पक्ष रूप से करने के आदेश दिए हैं।
मौजूदा मामले में याचियों ने दलील दी कि निकाह मुस्लिम रीति-रिवाज और लड़की की मर्जी से हुआ है। हालांकि, कोर्ट ने आरोपों को बेहद गंभीर मानते हुए याचिका खारिज कर दी। कहा कि रीति-रिवाज की आड़ में किसी को कानून के उल्लंघन का अनुमति नहीं दी जा सकती।
डीपीपी को सख्त दिशानिर्देश जारी करने का आदेश
कोर्ट ने बाल विवाह के बढ़ते मामलों पर लगाम लगाने के लिए डीजीपी को विस्तृत दिशानिर्देश जारी करने का आदेश दिया है। कहा है कि सभी पुलिस कमिश्नर, एसएसपी और एसपी को सख्त निर्देश दिया जाए कि जैसे ही पुलिस को किसी भी स्रोत (शिकायत, जांच या स्वतः संज्ञान) से बाल विवाह की जानकारी मिले, बिना किसी देरी के अधिनियम की धारा-10 और 11 के तहत शामिल सभी लोगों के खिलाफ संज्ञेय अपराध का मामला दर्ज किया जाए।
पुलिस की ढुलमुल कार्यशैली से कोर्ट हैरान
कोर्ट ने इस बात पर कड़ा असंतोष व्यक्त किया कि आज तक पुलिस की ओर से स्वतः संज्ञान लेकर इस कानून के तहत कार्रवाई करने का एक भी मामला सामने नहीं आया है। कानूनी रूप से स्पष्ट प्रावधान है कि जब भी पुलिस को शिकायत, जांच या किसी अन्य माध्यम से बाल विवाह की जानकारी मिले तो अधिनियम की धारा-10 और 11 के तहत विवाह कराने वाले और इसे बढ़ावा देने वाले सभी जिम्मेदार लोगों के खिलाफ बिना किसी देरी के कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए।
आधार कार्ड उम्र का वैध प्रमाण नहीं
कोर्ट ने उन सामाजिक और धार्मिक संगठनों की कार्यप्रणाली पर भी तीखी टिप्पणी की, जो इस तरह के अवैध विवाहों को सुगम बनाते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कई संगठन शादी के लिए बच्चियों के आधार कार्ड या हलफनामे को आधार बना लेते हैं, जबकि आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि उम्र का वैध कानूनी प्रमाण नहीं है।