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धर्मनगरी की झोली भर गया कांवड़ मेला
hridwar uttrakhanda india
Updated Wed, 03 Aug 2016 11:46 PM IST
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हरिद्वार की भरी झोली
- फोटो : अमर उजाला
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मेहताब आलम
हरिद्वार। करीब एक पखवाड़े तक चली कांवड़ यात्रा धर्मनगरी हरिद्वार की झोली भर गई। यात्रा के दौरान करीब तीन करोड़ कावंडिए गंगाजल भरने हरिद्वार पहुंचे। कांवड़ से लेकर साज सज्जा और आस्था के रंग में रंगने के लिए वेशभूषा, खानपान जैसी जरूरतें पूरी करने के लिए औसतन एक कांवड़िये ने दो हजार रुपये खर्च किए। यदि ऐसे कांवड़ियों की संख्या दो करोड़ भी मान ली जाए तो हरिद्वार में 10 दिन तक चले आस्था के मेले में चार अरब का अनुमानित कारोबार हुआ है। मेले के दौरान छोटे और मंझले कारोबारियों की आर्थिकी मजबूत हुई है।
श्रावण मास कांवड़ मेले की विधिवत शुरूआत इस साल 19 जुलाई को हुई। इससे पहले भी बड़ी संख्या में कांवड़ियों का यहां आना शुरू हो गया था। यात्रा के अंतिम चरण में दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों से बड़ी संख्या में कांवड़ यात्री हरिद्वार पहुंचे। अंतिम तीन दिनों में ही एक करोड़ से ज्यादा कांवड़िए बाइकों पर हरिद्वार पहुंचे। इस दौरान शहर के लोगों ने भले ही कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कांवड़ियों की ओर से फैलाई गई गंदगी को साफ करने में भी नगर निगम के पसीने छूट रहे हैं, लेकिन यात्रा दूसरा पहलू भी रहा है।
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31 अगस्त तक तीन करोड़ से ज्यादा कांवड़िए हरिद्वार पहुंचने का दावा खुद पुलिस प्रशासन की ओर से किया गया। कांवड़ियों की संख्या का आस्था के साथ-साथ आर्थिकी से भी सीधा कनेक्शन रहा है। प्रशासन के आंकड़ों और मेले में हर तरफ नजर आई भीड़ में तालमेल बैठाकर यदि संख्या दो करोड़ भी मानी जाए तो हरिद्वार ने कांवड़ मेले में सीधे सीधे चार सौ करोड़ का व्यापार किया है।
ऐसे खर्च हुए दो हजार रुपये
मेले के दौरान कांवड़, बर्तन, खानपान, परिवहन पर प्रति कांवड़िए ने दो हजार रुपये खर्च किए। गंगा जल ले जाने के लिए सजावट, घुंघरू, डमरु , सहित एक सामान्य कांवड़ तैयार करने में कम से कम एक हजार रुपये का खर्च आता है। भगवा वस्त्र के तौर पर कच्छा, बनियान, तौलिया समेत रुद्राक्ष, गंगाजलि, माला, अंगूठी आदि पर 400 रुपये खर्च आता है। दो से तीन टाइम खाना और जलपान पर 200 से 300 रुपये तक खर्च आसानी से हो जाता है। मोबाइल रिचार्ज के अलावा वाहनों पर आने वाले कांवड़ियों ने पेट्रोल-डीजल और पार्किंग शुल्क के तौर पर कम से कम 400 रुपये खर्च किए। वहीं पैदल चलने वाले कांवड़ियों ने रास्ते में जलपान पर भी कुछ न कुछ खर्च किया। इस लिहाज से औसतन एक कांवड़िए ने दो हजार रुपये तक खर्च किए हैं।
बाहरी कारोबारियों को मिला लाभ
कांवड़ मेले से सिर्फ स्थानीय व्यापारियों को ही लाभ नहीं हुआ, बल्कि बाहर से आए कारोबारियों ने भी मुनाफा कमाया। हरिद्वार के शहर और देहात के अलावा यूपी के बिजनौर, मेरठ, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, दिल्ली तक के कारोबारियों ने कांवड़ मेले में अलग अलग व्यापार किया। कांवड़ बनाने और बेचने वालों में यूपी के छोटे कारोबारियों की बाहुल्यता रही।
मेले में खाली रहे बड़े होटल
मेले के दौरान कांवड़ियों के अलावा अन्य श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या न के बराबर रही। दो से तीन दिन रुकने वाले कुछ कांवड़िए शिविरों, आश्रम व मंदिरों में ठहरे। वहीं छोटे गेस्ट हाउसों और धर्मशालाओं को भी ठिकाना बनाया। इस दौरान बड़े होटलों में श्रद्धालु, पर्यटक व यात्री नहीं पहुंच पाए।
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कांवड़ मेला वास्तव में छोटे व्यापारियों और गरीब लोगों के फायदे का मेला होता है। मेले के दौरान चाय का ढाबा, माला, कंघा, सिंदूर आदि सामान बेचने वालों को भी अच्छी आमदनी हुई है। छोटे होटल गेस्ट हाउसों में मेले के दौरान 50 हजार तक का कारोबार हुआ है।
महेश गौड़, अध्यक्ष धर्मशाला सुरक्षा समिति हरिद्वार
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कारोबार के लिहाज से कांवड़ मेला हरिद्वार के लिए बेहद महत्वपूर्ण और लाभकारी साबित हुआ। अर्द्घकुंभ में जो मंदी छाई थी, उसे काफी हद तक कांवड़ मेले ने दूर कर दिया है।
- ओमप्रकाश जमदग्नि, जिलाध्यक्ष व्यापार मंडल हरिद्वार