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Pauri News: त्याग का अर्थ संसार छोड़ना नहीं निष्काम भाव से कर्म करना
संवाद न्यूज एजेंसी, पौड़ी
Updated Tue, 26 May 2026 07:11 PM IST
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कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे 30 शोधार्थी और विद्वान
संवाद न्यूज एजेंसी
देवप्रयाग। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर में ईशोपनिषद् पर आधारित साप्ताहिक कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में दिल्ली, कोलकाता और आंध्र प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से आए 30 शोधार्थियों और विद्वानों ने प्रतिभाग किया। इस दौरान ईश्वर, आत्मा और अद्वैत दर्शन से जुड़े विषयों पर गहन चर्चा हुई। कहा गया कि उपनिषद् में त्याग का अर्थ संसार छोड़ना नहीं बल्कि निष्काम भाव से कर्म करना है।
कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने भारतीय ज्ञान परंपरा में ईशोपनिषद् की भूमिका को रेखांकित किया। परिसर निदेशक प्रो. पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने स्वागत भाषण दिया। मुख्य वक्ता प्रो. अरिंदम चक्रवर्ती ने बताया कि शुक्ल यजुर्वेद का 40वां अध्याय ईशोपनिषद् जीव-ब्रह्म के अभेद की व्याख्या करता है। उन्होंने ‘ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम्’ मंत्र के जरिये परमात्मा को पूर्ण व अनंत बताया और कहा कि इसके 18 मंत्र मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं। उपनिषद् में त्याग का अर्थ संसार छोड़ना नहीं बल्कि निष्काम भाव से कर्म करना है। अंतिम सत्रों में शरीर को नश्वर और आत्मा को अविनाशी बताते हुए इनके शाश्वत भेद पर चर्चा की गई। समापन अवसर पर प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने की और संचालन दर्शन विभाग के प्राध्यापक डॉ. किशोर शर्मा ने किया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
देवप्रयाग। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के श्री रघुनाथ कीर्ति परिसर में ईशोपनिषद् पर आधारित साप्ताहिक कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में दिल्ली, कोलकाता और आंध्र प्रदेश सहित देश के विभिन्न राज्यों से आए 30 शोधार्थियों और विद्वानों ने प्रतिभाग किया। इस दौरान ईश्वर, आत्मा और अद्वैत दर्शन से जुड़े विषयों पर गहन चर्चा हुई। कहा गया कि उपनिषद् में त्याग का अर्थ संसार छोड़ना नहीं बल्कि निष्काम भाव से कर्म करना है।
कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने भारतीय ज्ञान परंपरा में ईशोपनिषद् की भूमिका को रेखांकित किया। परिसर निदेशक प्रो. पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने स्वागत भाषण दिया। मुख्य वक्ता प्रो. अरिंदम चक्रवर्ती ने बताया कि शुक्ल यजुर्वेद का 40वां अध्याय ईशोपनिषद् जीव-ब्रह्म के अभेद की व्याख्या करता है। उन्होंने ‘ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदम्’ मंत्र के जरिये परमात्मा को पूर्ण व अनंत बताया और कहा कि इसके 18 मंत्र मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं। उपनिषद् में त्याग का अर्थ संसार छोड़ना नहीं बल्कि निष्काम भाव से कर्म करना है। अंतिम सत्रों में शरीर को नश्वर और आत्मा को अविनाशी बताते हुए इनके शाश्वत भेद पर चर्चा की गई। समापन अवसर पर प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. पीवीबी सुब्रह्मण्यम ने की और संचालन दर्शन विभाग के प्राध्यापक डॉ. किशोर शर्मा ने किया।
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