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चुनाव के बाद पाकिस्तान का रोडमैप?

Updated Mon, 13 May 2013 02:03 AM IST
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roadmap to pakistan after election
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पाकिस्तान ने राष्ट्रीय स्तर पर एक रुढ़िवादी दल से सत्ता छीन कर दूसरे रुढ़िवादी दल को सौप दी, साथ ही एक करिश्माई नेता के उग्र संदेश को भी नकार दिया।



नई सरकार ऐसे समय मे सत्ता संभाल रही है, जब पाकिस्तान के तीन सबसे ताकतवर व्यक्ति पद मुक्त हो रहे हैं।

नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग के आश्चर्यजनक तरीके से जीत हासिल करने के बाद फिलहाल पाकिस्तान की विदेश नीति में कोई बदलाव नहीं आएगा।

इसका मतलब ये हुआ कि अलकायदा और उसके सहयोगियों पर अमेरिका की ओर से होने वाले ड्रोन हमलों के लिए पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल जारी रहेगा, और ना ही कश्मीर पर पाकिस्तान का लचीले होते रुख और भारत के साथ बेहतर संबंधों की कोशिश में कोई बदलाव आएगा।
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क्रिकेट हीरो इमरान खान की तहरीक ए इंसाफ पार्टी ने पश्चिमोत्तर पखतून प्रांत में एक तरफा जीत हासिल की है। इसी दल ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाईयों के खिलाफ लोगों को लामबंद किया था।
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ये क्षेत्र उन काबायली इलाकों के पास स्थित हैं, जिन्हें फाटा कहा जाता है। ये ही वो इलाके हैं जो लगातार ड्रोन हमलों का निशाना बनते रहे हैं। इस चुनाव में सूबे की सरकार में मौजूद रही धर्मनिरपेक्ष अवामी नेशनल पार्टी की हार हुई है।

नीतियां प्रभावित नहीं
लेकिन इमरान खान को पंजाब जैसे बड़े राज्य में चंद सीटें ही हासिल हो पाईं हैं। इसलिए वो उन नीतियों को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं होंगे जिन्हें उन्होंने इस चुनाव अभियान के दौरान उठाया था।

इन मुद्दों में सेना और आम नागरिकों पर हमला करने वाले सुन्नी मुसलमानों के साथ समझौता भी शामिल है। इन सुन्नी मुसलमान की मांग है कि लोकतंत्र की जगह शरिया कानून लागू किया जाए और इसे पूरी तरह से इस्लामी देश बनाया जाए।

फिलहाल पाकिस्तान की आंतरिक नीतियों में बदलाव की संभावना भी नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती चरमपंथ से निपटने की है, जिसने देश की अर्थव्यवस्था को चौपट कर दिया है।

शरीफ परिवार ने चरमपंथियों के प्रति नरम रवैया अपनाया, क्योंकि उन्हें इस बार पंजाबी वोटों की दरकार थी।

साथ ही 1990 के अंतिम सालों के दौरान नवाज शरीफ ने एक व्यक्ति के हाथ में सत्ता के सिद्धांत पर आधारित इस्लामी कानून को पारित कराने की कोशिश की थी।

लेकिन ये हुआ नहीं और इसके बाद उनके रवैये में बदलाव आया है।

साल 2002 के बाद अमेरिकी दवाब के चलते पाकिस्तान ने उन चरमपंथी संगठनों को मदद पहुंचाने पर रोक लगाई है, जिसका इस्तेमाल वो पड़ोसियों के खिलाफ छद्म युद्ध चलाने के लिए करते थे। लेकिन अब उन्हें उन्हीं के खिलाफ लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

दोनों ही बड़े राजनीतिक दलों, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान मु्स्लिम लीग नवाज का इस मामले में नजरिया साफ है कि इससे पाकिस्तान की छवि खराब हुई है और इसे खत्म किया जाना चाहिए।

इस मुद्दे पर उन्होंने पाकिस्तान की शक्तिशाली सेना को समर्थन दिया है, ताकि आगे का रास्ता निकालना सुनिश्चित किया जा सके।

दूसरा महत्वपूर्ण आंतरिक मसला ये है कि कैसे बलूचिस्तान के पृथकतावादियों से निपटा जाए। फिलहाल तो उन्हें बल प्रयोग से दबा दिया गया है लेकिन वो स्वायत्ता की मांग पूरी होने का इंतजार कर रहे हैं। भले ही आजादी का उनका सपना अभी ना पूरा हो सके।

शरीफ जब इन सारी समस्याओं से जूझने की कोशिश कर रहे होंगे तो उन्हें देश की सर्वाच्च अदालत का सामना करना पड़ेगा, जो कि काफी सक्रिय है और राजनेताओं के अक्सर खिलाफ नजर आई है।

न्यायपालिका से चुनौती
मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार गिलानी इस साल सेवानिवृत्त होने वाले हैं, लेकिन समझा जाता है कि उनके सहयोगी न्यायाधीश और निचली अदालतों के जज विधायिका और कार्यपालिका की गतिविधियों में उसी सक्रियता से हस्तक्षेप करना जारी रखेंगे।

इन चुनावों में सबसे करारी हार राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की पीपल्स पार्टी को झेलनी पड़ी। पार्टी को ग्रामीण सिंध के पारंपरिक गढ़ को छोड़ कर हर जगह हार का सामना करना पड़ा।

जरदारी को खुद जल्द ही राष्ट्रपति का वो कार्यलय छोड़ना पड़ेगा, जिस पर पिछले पांच साल से वो सत्तासीन हैं।

पाकिस्तान में भी राष्ट्रपति का चयन उसी अप्रत्यक्ष प्रणाली से होता है, जिस तरह से भारत में होता है। कुछ महीनों में ये चुनाव होंगे और इसे जीतने के लिए अब उनके पास पर्याप्त वोट नहीं होंगे।

कियानी के बाद
इस साल जाने वाले तीसरे महत्वपूर्ण व्यक्ति पाकिस्तानी सेना के प्रमुख परवेज कियानी हैं। जिनके दौर में ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में मारे गए और उन्हें इसका अपमान सहना पड़ा। चंद महीने में ही वो सेवानिवृत्त हो जाएंगे।

कियानी ने धीरे धीरे आंतरिक चरमपंथियों के खिलाफ कड़ी कारवाई का समर्थन किया, लेकिन पूरी सेना इस पर एक राय नहीं रखती थी। और आने वाले दिनों में उनके सहयोगी जनरल इस मामले में नीतियों की दिशा तय करेंगे।

परवेज मुशर्रफ का क्या?
कियानी से पहले सेना की कमान संभालने वाले पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के पिछले कुछ हफ्ते बेहद खराब गुजरे।

उन पर पहले हत्या के लिए मुकदमा चलाया गया और फिर उन्हें चुनाव में हिस्सा लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया। लंदन से उनकी पाकिस्तान वापसी भारी भूल साबित हुई।

शरीफ ही वो व्यक्ति थे जिन्हें मुशर्रफ ने उखाड़ फेंका, जेल भिजवाया और यहां तक कि निर्वासित कर दिया, इसलिए शरीफ पूर्व सेनाअध्यक्ष के प्रति संवेदना नहीं दिखाएंगे।

पाकिस्तान की सेना में तमाम लोगों ने इमरान खान की आतंक के खिलाफ लड़ाई में हिस्सेदारी खत्म करने के रवैये का समर्थन किया, क्योंकि फौज के हजारों जवान व अधिकारी इस लड़ाई की भेंट चढ़ गए हैं। फौज के एक हिस्से का मानना है कि वो अपने ही लोगों के खिलाफ जंग लड़ रहे है।

दशकों तक अफगानिस्तान और कश्मीर में सेना एक तय नीति पर चलती रही, लेकिन सेना में अब भ्रम कि स्थिति है। नीतियों में बदलाव नजर आता है।

आंतरिक खतरों की पहचान जनरल करते हैं लेकिन सेना के जवानों को अब तक नहीं पता कि आखिर जेहाद का नारा क्यों बंद कर दिया गया।

अर्थव्यवस्था
पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या उसकी अर्थव्यवस्था है, जो कि दक्षिण एशियाई देशों में सबसे कमजोर है।

नवाज शरीफ एक उद्योगपति हैं और उनसे उम्मीद की जाती है कि वो लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के लिए जरदारी से बेहतर प्रबंधक साबित होंगे। जरदारी सामंती तरीके से काम करते रहे और देश की सकल घरेलू उत्पाद दर गिरती रही।

अब शरीफ के पास एक मौका है, नीतियों का शीघ्र निर्माण कर पाकिस्तान को शांति और प्रगति के पथ पर ले जाने का, क्योंकि उनके साथ नए सेनाध्यक्ष होंगे, नए मुख्य न्यायाधीश होंगे और जल्द ही नए राष्ट्रपति भी होंगे।

आकार पटेल, वरिष्ठ पत्रकार

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