भाई लोग सरकार से नाराज हैं। डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम के नामकरण का क्रेडिट उन्हें नहीं मिल पाया। उनका दावा है कि अपने धंधे में सबसे पहले उन्होंने ही डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम को पूरी शिद्दत के साथ लागू किया। बल्कि डायरेक्ट कैश ट्रांसफर तो उनके धंधे की जान है। भाई लोगों के उगाही के धंधे में पेटी, खोखा भी तो डायरेक्ट कैश ट्रांसफर की विधा के ही रूप हैं।
फर्क सिर्फ इतना है कि सरकार ‘आधार’ के साथ कैश ट्रांसफर करेगी, जबकि भाई लोग बिना आधार के ही डायरेक्ट कैश ट्रांसफर करवा देते हैं। चूंकि भाई लोगों के धंधे में कैश ट्रांसफर का कोई आधार नहीं होता, इसलिए कई बार थोड़ी ऊंच-नीच, मारधाड़, चाकूबाजी, गोलीबारी, फोन पर धमकी इत्यादि छोटी-मोटी तकनीकी गलतियां हो जाती हैं। इसकी वजह से कई बार उनका जेल आना-जाना भी हो जाता है। इसके बावजूद डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम का श्रेय तो भाई लोगों को जाता ही है। कॉपीराइट तो उन्हीं का बनता है।
वैसे हमारे सिस्टम में डायरेक्ट कैश ट्रांसफर की परंपरा पहले से ही काफी समृद्ध रही है। हाइवे पर जब पुलिसवाले ट्रक ड्राइवरों से उलझते दिखें, तो समझ लीजिएगा कि डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम के बारे में बात हो रही है। ट्रक ड्राइवर की जेब से कैश पुलिसवाले की जेब में ट्रांसफर होते ही यह स्कीम हाइवे पर फर्राटे से दौड़ने लगती है। ऐसी चलती-फिरती, द्रुत गति से भागती डायरेक्ट कैश ट्रांसफर स्कीम सरकार कभी लागू करवा सकती है भला!
हाइवे ही क्या, किसी सरकारी दफ्तर में भी डायरेक्ट कैश ट्रांसफर की कई मिसालें देखी जा सकती हैं। इस स्कीम का ठीक ढंग से अमल न होने पर अमूमन सरकारी दफ्तरों में फाइलें आगे नहीं बढ़ पातीं। लोगों में जागरूकता की कमी है। वैसे जो समझदार लोग होते हैं, वे इस अलिखित किंतु प्रभावी योजना की भावनाओं को बखूबी समझते हैं, इसलिए बाबू या अफसर की जेब में डायरेक्ट कैश ट्रांसफर करके फाइल की राह में तमाम अड़चनें दूर कर देते हैं। इस तरह सिस्टम भी चलता रहता है और सरकार भी। हमारे सिस्टम में जब डायरेक्ट कैश ट्रांसफर की यह विधा इतनी मजबूती के साथ जड़ें जमाए हुए है, तो मेरा मानना है कि सरकार को इस विधा को कला के रूप में मान्यता दे देनी चाहिए। आखिर राजा-महाराजाओं के जमाने में भी कलाओं को राज्याश्रय तो मिलता ही रहा है।