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कानून को हाथ में लेने वाले

पत्रलेखा चटर्जी Updated Tue, 11 Apr 2017 12:16 PM IST
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पत्रलेखा चटर्जी
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कानून के शासन के बारे में एक स्थायी सत्य है कि या तो आप इसमें विश्वास करते हैं या नहीं करते। एक बार जब आप किसी कानून को किसी एक समूह के लिए अपवाद बनाते हैं या जब वे कानून को अपने हाथों में लेते हैं और आप यह मानकर कि वे आपके जैसा सोचते हैं उस पर ध्यान नहीं देते, तो निश्चित मानिए कि दूसरा समूह कानून के उल्लंघन के लिए प्रोत्साहित होगा। फिर उसके बाद कोई और समूह और फिर कोई और समूह। तत्काल न्याय की इच्छा संक्रामक है, जैसा कि हम देश में देख रहे हैं।
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हाल की कुछ घटनाओं का उदाहरण लीजिए, जो सुर्खियों में रही हैं। उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में अफ्रीकी समुदाय के कुछ लोगों को बर्बरतापूर्वक पीटा गया, क्योंकि पड़ोस के एक लड़के की ड्रग (मादक पदार्थ) के अत्यधिक सेवन के चलते मौत हो गई और कुछ लोगों को लगा कि नाइजीरियाई छात्र इसके लिए जिम्मेदार हैं। क्या इसका कोई सबूत था? इस सवाल का उत्तर है-नहीं। लेकिन इसने उन हमलावरों को नहीं रोका, जिन्होंने फैसला किया कि तत्काल न्याय जरूरी है।

इसी तरह की घटना हमने फिर मुस्लिम डेयरी किसान के मामले में देखी, जिसे अलवर में स्वयंभू गौ-रक्षकों ने बर्बरतापूर्वक पीटा, क्योंकि उन हमलावरों को लगा कि वह गौ-तस्कर है और उन्होंने स्वयं ही न्याय करने का फैसला कर लिया, क्योंकि उनकी नजर में यह उचित था। नतीजतन वह मुस्लिम डेयरी किसान की मौत हो गई। एक दूसरे प्रकरण में हमने देखा कि एक संसद सदस्य ने एयर इंडिया के एक कर्मचारी पर हमला कर दिया, क्योंकि उसने उन्हें मनमानी नहीं करने दी।
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कई बार भीड़ गौ-रक्षा के नाम पर कानून को अपने हाथ में ले लेती है। कभी-कभी कानून हाथ में लेने की घटनाएं पूरी तरह से पूर्वाग्रह के कारण होती है, जैसा कि अफ्रीक्री लोगों और देश के विभिन्न हिस्सों में हाल के वर्षों में बार-बार हुए हमले में देखने को मिला है। कभी-कभी महिला सम्मान की रक्षा के नाम पर कानून हाथ में लिया जाता है, जो कानून की पूरी तरह अवज्ञा करते हुए दूसरों पर अपनी हिंसक नैतिकता को लादने की इच्छा का प्रतिबिंब है। कई सांसद एवं विधायक भी खुद को कानून से ऊपर समझते हैं।

कानून के राज की अवमानना एक ऐसी भयावह बीमारी है, जो पूरे देश में तेजी से फैल रही है, चाहे वहां किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो। हम ऐसा भाजपा शासित प्रदेशों में ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में भी देख सकते हैं।

हाल के वर्षों में पूरे देश में सड़कों पर फैलती हिंसक घटनाएं अखिल भारतीय स्तर संस्थानों के साथ अधैर्य का संकेत करती हैं, जो कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करने और न्याय वितरण करने की मांग करती हैं। दीर्घकालीन अर्थों में भारत के लिए इसका क्या मतलब है? क्या कानून की अवज्ञा (भीड़ तंत्र के न्याय) के साथ विकास संभव है?

सिर्फ आर्थिक विकास से ही विकास नहीं हो सकता है। विकास के लिए कानून का राज और मानवधिकार भी उतना ही जरूरी है। न्याय, सुरक्षा और विकास को अलग-अलग या दूसरे की कीमत पर नहीं बढ़ाया जा सकता। कानून का राज बेढब, अमूर्त निरर्थक चीज नहीं है। यह वास्तविक है। कानून के राज के माध्यम से ही संस्थानों को मजबूत किया जाता है। और मजबूत संस्थाएं ही देश के विकास का आधार होती हैं।

कानून की अवज्ञा या भीड़तंत्र का न्याय भारत में कोई नई बात नहीं है और न ही यह हमारे देश के लिए अनूठी अवधारणा है।  और न ही इसका संबंध केवल हाशिये पर रहने वाले और अत्यंत निर्धनों पर हमले से है। जरा राजस्थान में कश्मीरी छात्रों पर भीड़ के हमले के बारे में सोचिए, जिन पर इस कारण हमला किया गया था, क्योंकि अफवाह फैल गई थी कि वे बीफ पका रहे हैं। बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने कर्नाटक के मंगलौर में जबरन बूचड़खानों को बंद कराया और बूचड़खाने के मालिक की हत्या कर दी थी। इस संदर्भ में वर्ष 2007 में पश्चिम बंगाल के छह दक्षिणी जिलों में भड़के राशन दंगे को भी याद किया जा सकता है, जो राशन की दुकानों में साल भर से अनाज की कमी के कारण भड़का था। भीड़ ने राशन डीलरों की दुकानों और घरों को तोड़ दिया था, जिनमें से चार ने अंततः आत्महत्या कर ली।

विवादास्पद मुद्दा सामान्य रूप से यह हैः भय की तीव्रता जिसके जरिये कानून हाथ में लेने वाले कानून के राज का मजाक बनाते हैं, जो राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक नियमों के स्वीकार्य ढांचे के आसपास राज्य और समाज के बीच के संबंधों को आधार प्रदान करते हैं। कानून का राज और विकास परस्पर एक-दूसरे को मजबूत बनाते हैं। जिन देशों में लोग कानून को अपने हाथों लेते हैं, वैसे देश विकसित दुनिया का हिस्सा नहीं हैं। स्वाभाविक परिणाम भी सच हैं। अर्थशास्त्रियों ने अपने अध्ययन में बार-बार यह निष्कर्ष पाया है कि जिन देशों में कानून-व्यवस्था की स्थिति बेहतर होती है, वह राष्ट्र ज्यादा समृद्ध होता है।

अपनी भयावह प्रकृति के कारण भीड़ की हिंसा को अखबारों में मुख्य पृष्ठ पर जगह दी जाती है। यह लोगों को डराता है और उनकी ऊर्जा का क्षरण करता है। यह असली सवालों को सफलतापूर्वक दूर धकेल देता है, जिन्हें हमें पूछना चाहिए और जो विकास के लिए जरूरी उपकरण हैं। स्कूलों में दाखिला लेने वाले कितने बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं और क्यों? हाल के वर्षों में बनाए गए कितने शौचालयों का उपयोग हो रहा है और उनकी अच्छी तरह से देखभाल होती है? प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की क्या स्थिति है? और हमारी बढ़ती युवा आबादी को रोजगार या नौकरी उपलब्ध कराने के लिए हमारे पास क्या इंतजाम हैं? ये सब ऐसे जरूरी सवाल हैं, जो हिंसक घटनाओं के कारण पीछे धकेल दिए जाते हैं। राष्ट्र के विकास के लिहाज से इसे शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता।
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