उत्तराखंड आपदा आए छह माह पूरे हो गए, लेकिन प्रभावित क्षेत्रों में आज भी कई काम अधूरे हैं।
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सरकारी तंत्र अपने दावों के अनुसार प्रभावितों के जख्मों पर मरहम लगाने में नाकाम रहा। चाहे पुनर्वास हो या फिर विस्थापन, सड़कों हों या फिर पुल निर्माण। सारे कार्य सिर्फ कागजों में ही चल रहे हैं।
पुनर्वास की हालत अधिक खराब
हालांकि शासन दावा कर रहा है कि कार्य जनवरी तक शुरू हो जाएंगे। 16-17 जून को केदारघाटी में आई तबाही के बाद राहत और बचाव कार्य को अंजाम देने में सरकार को दो माह लगे।
इसके बाद पुनर्निर्माण के काम करने का दावा किया गया था। लेकिन आपदा के छह माह बाद भी सरकार इस काम को तरीके से आगे नहीं बढ़ा पाई।
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सबसे अधिक खराब हालत पुनर्वास की है। प्रदेश में करीब 300 गांवों का पुनर्वास होना है। विस्थापित होने वाले पालना, भ्यूंदार जैसे गांवों के लिए तो अभी तय ही नहीं हुआ कि इनको बसाया कहां जाएगा। हाल यह है कि इनको बसाने के लिए जमीन का बंदोबस्त भी नहीं हो पाया है।
हालांकि यह कहा गया था कि पांच हेक्टेयर तक की वन भूमि इन गांवों के विस्थापन के लिए हस्तांतरित की जा सकती है। पर कायदे से अभी प्रदेश सरकार प्रस्ताव ही नहीं बना पाई है। यही हाल प्री फेब्रिकेटेड (रेडीमेड) मकानों का है।
सड़क और पुल निर्माण का काम अधूरा
यह मामला भी एकमुश्त राशि देने और वर्ल्ड बैंक की शर्तों के तहत किस्तों में पैसा देकर मकान बनाने में उलझा हुआ है।
सड़क और पुल निर्माण के काम का भी यही हाल है। केंद्र से स्वीकृत हुए सात हजार करोड़ के पैकेज के तहत सड़कों और पुलों का निर्माण का काम उत्तराखंड के पुनर्निर्माण पैकेज का हिस्सा है।
इसमें अभी कागजी कार्रवाई पर मामला उलझा हुआ है। अपर मुख्य सचिव राकेश कुमार के मुताबिक 15 जनवरी तक हर हाल में निर्माण कार्य शुरू किया जाना है। इससे पहले निविदाएं आमंत्रित करने से लेकर अन्य औपचारिकताएं पूरी की जा रही हैं।
...जीईपी पर भी खामोशी
आपदा के बाद विकास और पर्यावरण में संतुलन साधने का दावा करने वाली सरकर ने अपनी जोर शोर से की गई ग्रॉस इन्वायरमेंट प्रोडक्ट लागू करने की घोषणा पर भी चुप्पी साध ली है। हाल यह है कि जीईपी के मानक तय करने के लिए गठित कमेटी की दूसरी बैठक की तिथि अभी तक तय नहीं हो पाई है।
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शासन का कहना है कि हिमालयी राज्यों और पड़ोसी देशों के सम्मेलन के बाद ही जीईपी के मानक तय हो पाएंगे। सम्मेलन के लिए अभी संबंधित राज्यों और पड़ोसी देशों से सहमति ली जा रही है। यह तब है जबकि सरकार बजट सत्र में जीईपी लेकर आने की बात कर चुकी है।
...सीमेंट कारखानों से भी परहेज नहीं
एक तरफ आपदा के बाद विकास और पर्यावरण में संतुलन का दावा है तो दूसरी तरफ सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए पर्यावरण को चुनौती देने से भी नहीं कतरा रही है। कोकाकोला प्लांट के मामले को डंप करने के बाद अब त्यूनी और सोमेश्वर में सीमेंट प्लांट लगाने की तैयारी की जा रही है।
इस पर सहमति बन चुकी है। हालांकि समाजसेवी संस्थाएं और पर्यावरणविद् इसके विरोध में हैं पर सरकार का तर्क है कि इससे प्रदेश में पांच हजार करोड़ रुपए का पूंजी निवेश होगा।
आपदा प्रबंधन भी आपदाग्रस्त
आपदा प्रबंधन को पटरी पर लाने का काम भी प्रदेश में आपदाग्रस्त है। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेश्यिर की निगरानी तंत्र विकसित करने से लेकर ग्लेश्यिर के खिसकने से बनी झीलों के टूटने पर आने वाली बाढ़ के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित होना है।
इसके लिए डापलर रडार लगाने की बात थी। खुद केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत ने कहा था कि जल्दी ही नदियों की फ्लड जोन मैपिंग शुरू की जाएगी। आपदा प्रबंधन की सर्वोच्च संस्था राज्य आपदा प्राधिकरण की बैठक आपदा के छह माह बाद भी नहीं हुई।
सड़क निर्माण की तकनीक बदलने का वादा भी अधूरा
सड़क निर्माण की तकनीक बदलने के लिए केंद्रीय ग्राम्य विकास मंत्री जयराम रमेश ने दून में अक्तूबर माह में कार्यशाला आयोजित कराने का भरोसा दिलाया था। पर दिसंबर का पहला पखवाड़ा बीत जाने के बाद भी कार्यशाला नहीं हो पाई।
ऐसे में सड़कों का निर्माण प्रदेश में पहले की ही तरह होने की आशंका है। जाहिर है कि बड़े पैमाने पर होने वाला यह निर्माण कार्य फिर आपदा की भयावहता को बढ़ाने वाला साबित हो सकता है। हालांकि वर्ल्ड बैंक के सहयोग से बनने वाली सड़कों के लिए ड्रेनेज सिस्टम बनाने, स्लोप मैनेजमेंट आदि की शर्त रखी हुई है।