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जीवन एक सफर ही तो है: अस्पताल से वर्ल्ड रिकॉर्ड तक, संघर्षों से सीखकर शिखर तक पहुंचने की कहानी

अमर उजाला Published by: Devesh Tripathi Updated Sat, 13 Jun 2026 06:45 AM IST
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सार
टोक्यो ओलंपिक के बाद बहुत-से लोगों ने मेरी आलोचना की और मुझे खलनायक बना दिया, जबकि मैं वहां मौजूद भी नहीं था। जब आप कोच होते हैं, तो सबसे जरूरी है एथलीट की बात सुनना, न कि उन पर अपनी राय थोपना। एथलीट को हमेशा तैयार रखना कोच का काम होता है।
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स्मृति शेष जसपाल राणा - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

मैंने 10 साल की उम्र में शूटिंग और 11 या 12 साल की उम्र में स्टेट और नेशनल लेवल की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया। मेरे पिता स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) में तैनात थे, जिससे मुझे हथियारों और खेल के तौर पर शूटिंग के बारे में जानने-समझने का मौका मिला। मैं पिस्तौल और राइफल, दोनों ही अच्छी तरह चलाता था, लेकिन फेडरेशन ने नियम बना दिया कि कोई व्यक्ति राइफल या पिस्तौल में से सिर्फ एक ही तरह की शूटिंग कर सकता है। मैंने पिस्तौल को चुना।


बतौर शूटर मेरी सभी उपलब्धियां यादगार हैं, क्योंकि इसमें लगभग 16 वर्षों की जीत-हार और काफी उतार-चढ़ाव शामिल हैं। पर, 1994 की मिलान वर्ल्ड चैंपियनशिप में वर्ल्ड रिकॉर्ड के साथ गोल्ड मेडल जीतना मेरे लिए खास है, क्योंकि प्रतिस्पर्धा से एक रात पहले मैं हॉस्पिटल में था; मेरे घुटने पर एक फोड़ा हो गया था और मेरी हालत बहुत खराब थी। डॉक्टरों ने मुझे डिस्चार्ज करने से मना कर दिया था। मेरे कोच सनी थॉमस ने वहां से भागने का फैसला किया, क्योंकि मैं शूटिंग करना चाहता था। तो हमने वही किया (भाग गए), पर उसी रात फोड़ा फूट गया और मुझे बहुत दर्द हुआ। मैं पूरी रात सो नहीं पाया। मैंने कोई पेनकिलर भी नहीं ली, क्योंकि मुझे डोप नियमों के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं थी। मैं अपनी जींस भी नहीं उतार पा रहा था। इसलिए, अगली सुबह अपने इवेंट में हिस्सा लेने के लिए मुझे उसे काटकर शॉर्ट्स बनाना पड़ा। मैं बस अपना इवेंट खत्म करके डॉक्टर के पास जाकर पेनकिलर लेना चाहता था। शूटिंग के ठीक बाद मैंने ऐसा ही किया। बाद में, मेरे कोच ने आकर बताया कि मैंने गोल्ड जीता है और यह एक जूनियर वर्ल्ड रिकॉर्ड है। उसके बाद मुझे यह भी पता नहीं चला कि मेरा दर्द कितना ज्यादा था। किसी दूसरे देश में अपने देश का झंडा ऊंचा लहराते देखना और स्वर्ण पदक के साथ घर लौटना एक बहुत ही शानदार एहसास था। लेकिन मेरा मानना है कि जीवन एक सफर है, कोई मंजिल नहीं। मैं खुद को भी एक सफर में मानता हूं और संघर्षों को रुकावट की जगह प्रेरणा के तौर पर देखता हूं।


टोक्यो ओलंपिक के बाद बहुत-से लोगों ने मेरी आलोचना की और मुझे खलनायक बना दिया, जबकि मैं वहां मौजूद भी नहीं था। जब आप कोच होते हैं, तो सबसे जरूरी है एथलीट की बात सुनना, न कि उन पर अपनी राय थोपना। एथलीट को हमेशा तैयार रखना कोच का काम होता है। मैं जो कुछ भी देखता, समझता और नोट करता हूं, उस पर एथलीट से चर्चा करता हूं। कोच प्रेरित कर सकता है, लेकिन शूटिंग रेंज में प्रदर्शन एथलीट को ही करना होता है। मेरे लिए कोचिंग एक जुनून है। मैंने कभी किसी ऐसे शूटर को मना नहीं किया, जिसने मुझसे संपर्क किया। लेकिन सिर्फ भावनाओं से मैच नहीं जीते जाते। आपको उस व्यक्ति का दोस्त और कोच बनना होता है, जिसे आप प्रेरित करते हैं और जिससे आप उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन निकलवा सकते हैं। मैं ऐसा करने की कोशिश करता हूं।    (विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित)
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