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कैसे निकलेगा हल: बहुत कठिन है डगर परिसीमन विधेयक की!
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सार
परिसीमन का प्रश्न केवल संसदीय सीटों की संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि संघीय संतुलन का भी है। दक्षिण भारत के कई राज्यों का तर्क है कि उन्होंने दशकों पहले केंद्र की नीतियों के अनुरूप जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया।
परिसीमन बिल 2026
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
ममता बनर्जी और एमके स्टालिन की चुनावी पराजय के बाद भाजपा खेमे में परिसीमन को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि संसद में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत अभी भी उसके पास नहीं है, लेकिन पार्टी नेतृत्व इस विषय को आगे बढ़ाने के प्रति उत्साहित दिखाई देता है।
लोकसभा में एनडीए के पास वर्तमान में 292 सांसद हैं। यदि तृणमूल कांग्रेस के कथित 20 बागी सांसदों का समर्थन भी मान लिया जाए, तो यह संख्या 312 तक पहुंच सकती है। इसके बावजूद संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा।
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विशेषकर इसलिए क्योंकि डीएमके जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय दल परिसीमन के मौजूदा प्रस्तावों को लेकर गंभीर आपत्तियां रखते हैं। डीएमके की असहमति के पीछे दो प्रमुख कारण हैं।
पहला, पार्टी भले ही विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक से दूरी बना चुकी हो, लेकिन उसने एनडीए का हिस्सा बनने के संकेत भी नहीं दिए हैं। दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण कारण परिसीमन की प्रकृति को लेकर उसका राजनीतिक दृष्टिकोण है।
डीएमके का मानना है कि जनसंख्या आधारित नई सीटों का पुनर्वितरण दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनीतिक प्रभाव को कम कर सकता है और उत्तर भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ा सकता है।
उत्तर बनाम दक्षिण का विवाद
परिसीमन का प्रश्न केवल संसदीय सीटों की संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि संघीय संतुलन का भी है। दक्षिण भारत के कई राज्यों का तर्क है कि उन्होंने दशकों पहले केंद्र की नीतियों के अनुरूप जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया।
यदि अब सीटों का बंटवारा मुख्यतः जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो अपेक्षाकृत कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को अतिरिक्त राजनीतिक लाभ मिलेगा।
इसी कारण तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और अन्य दक्षिणी राज्यों में यह आशंका व्यक्त की जाती रही है कि परिसीमन से संसद में उनकी सापेक्ष शक्ति कमजोर हो सकती है।
शर्तों का पेच और "फ्लैट 50 प्रतिशत मॉडल"
डीएमके का सुझाव है कि यदि लोकसभा की कुल सीटें बढ़ाई भी जाएं, तो राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का अनुपात 1971 की जनगणना के आधार पर लगभग यथावत रखा जाए। पार्टी चाहती है कि इस सिद्धांत को केवल राजनीतिक आश्वासन नहीं बल्कि कानूनी संरक्षण भी मिले।
दूसरी ओर, गृह मंत्री अमित शाह ने एक "फ्लैट 50 प्रतिशत मॉडल" का उल्लेख किया है। इस अवधारणा के अनुसार प्रत्येक राज्य की वर्तमान सीटों में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि की जा सकती है। इस मॉडल के तहत लोकसभा की कुल सदस्य संख्या 543 से बढ़कर 816-850 के बीच पहुंच सकती है।
सरकार का तर्क है कि इससे किसी भी राज्य की मौजूदा सीटें कम नहीं होंगी और दक्षिणी राज्यों को भी पर्याप्त अतिरिक्त प्रतिनिधित्व मिलेगा। उदाहरण के लिए, तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर लगभग 59 तथा दक्षिण के पांच राज्यों की कुल सीटें 129 से बढ़कर लगभग 195 हो सकती हैं।
हालांकि दक्षिणी दलों का कहना है कि केवल राजनीतिक आश्वासन पर्याप्त नहीं है। उन्हें संवैधानिक और कानूनी गारंटी चाहिए।
आर्थिक सलाहकार परिषद का प्रस्ताव
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद द्वारा तैयार एक वर्किंग पेपर में लोकसभा की सीटें लगभग 824 तक बढ़ाने का सुझाव दिया गया है। इसके लिए 170 बड़े संसदीय क्षेत्रों के पुनर्गठन का प्रस्ताव है, जिनमें 111 सीटों को तीन हिस्सों और 59 सीटों को दो हिस्सों में विभाजित करने की बात कही गई है।
यदि इसी दिशा में आगे बढ़ा जाता है, तो दक्षिणी राज्यों में भी सीटों की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकती है- तमिलनाडु 39 से 59, कर्नाटक 28 से 42, केरल 20 से 30 और तेलंगाना 17 से 26 तक पहुंच सकते हैं।
इसी प्रकार उत्तर और पश्चिम भारत के बड़े राज्यों में वृद्धि का अनुमान और भी अधिक है- उत्तर प्रदेश 80 से 120, बिहार 40 से 60, महाराष्ट्र 48 से 72, राजस्थान 25 से 38, मध्य प्रदेश 29 से 44, गुजरात 26 से 39 तथा पश्चिम बंगाल 42 से 63 सीटों तक पहुंच सकते हैं।
राजनीतिक चुनौती बरकरार
यहीं परिसीमन विधेयक की सबसे बड़ी चुनौती छिपी है। सीटों की कुल संख्या बढ़ाने पर व्यापक सहमति बन सकती है, लेकिन राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व के अनुपात को लेकर उत्तर और दक्षिण भारत की राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं।
भाजपा के लिए वास्तविक चुनौती केवल संसदीय बहुमत जुटाना नहीं, बल्कि उन आशंकाओं का समाधान करना भी है जो दक्षिणी राज्यों में संघीय संतुलन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर मौजूद हैं।
इसी वजह से परिसीमन का सवाल केवल गणित का नहीं, बल्कि भारतीय संघवाद की राजनीति का भी प्रश्न बन चुका है।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।