अंबाला। अंतर बैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपये कमजोर होने से यहां के दवा और साइंस उद्यमियों का दम फूलने लगा है। दवा और साइंस इंडस्ट्री इस आर्थिक उठापटक से एकदम हांफ गई है। इन उद्योगों को आने वाले वित्त वर्ष में अरबों रुपये का फटका लगने वाला है।
इन उद्यमियों के समक्ष समस्या यह है कि रुपये के टूटने से उद्योगों को बाहर से आयात करने वाला कच्चे माल की लागत बढ़ जाएगी, लेकिन जो डील इन उद्योगों ने अपने देशी और विदेशी उपभोक्ताओं से कर रखी है, वह पुराने रेट पर ही कर रखी है। ऐसे में विदेश से आने वाले कच्चे माल की लागत बढ़ जाएगी। लेकिन उद्यमियों को उपभोक्ताओं को माल पुराने रेट पर ही देना होगा।
आर्थिक संकट से जूझेगी साइंस इंडस्ट्री
देश में शैक्षणिक व मेडिकल साइंस उपकरणों का उद्योग अंबाला छावनी में ही है। साइंस सिटी हर साल 400 करोड़ का विदेशी कारोबार करती है, जबकि इतना ही लगभग स्वदेशी कारोबार करती है। हर साल इस इंडस्ट्री को चीन, चेक गणराज्य, रूस, जर्मनी से एडवांस किस्म के आप्टिकल ग्लास, ग्लास ट्यूबिंग, माइक्रोस्कॉप के एडवांस पार्ट्स मंगवाने पड़ते हैं। ये आयात करीब 115 करोड़ का होता है।
दवा उद्योग की टूटेगी कमर
अंबाला का दवा उद्योग की कमर भी रुपये टूटने के साथ टूट जाएगी। दवा उद्यमियों को भी भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ेगा। नार्थ इंडिया में दवा उद्योग को लगभग 1000 करोड़ का कच्चा माल केमिकल के रूप में विदेशों से मंगवाना पड़ता है। इसमें से अंबाला दवा उद्योग भी इसमें से 250 करोड़ के आसपास कच्चा माल विदेशों से मंगवाता है। उसके बाद दवाएं तैयार होती है और देश और विदेश में भेजी जाती है। इसमें भी समस्या यह है बाहर से आने वाली लागत तो बढ़ जाएगी, लेकिन उद्यमियों को माल पुराने कांट्रेक्ट रेट पर ही बेचना पड़ेगा। यानी दवा उद्यमियों को भी भारी नुकसान झेलना पड़ेगा।
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कोट
दवा इंडस्ट्री को जबरदस्त झटका लगने वाला है। बाहर से भारी मात्रा में केमिकल कच्चे माल के रूप में आता है। उसकी लागत तो बढ़ जाएगी। लेकिन एकदम देश व विदेश के उपभोक्ताओं को रेट बढ़ाकर नहीं बेचा जा सकता। क्योंकि मूल्य वृद्धि नियमानुसार ही होती है। जिस हिसाब से रुपया टूटा है, उस हिसाब से दवा उद्योग की कमर टूटने वाली है।
-भाई गुरदेव दत्त छिब्बर, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट, स्माल मेन्युफैक्चरर फार्मास्यूटिकल इंडिया कनफेडरेशन-
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साइंस उपकरण को तैयार करने के लिए काफी माल विदेशों से आयात किया जाता है। डॉलर के मुकाबले रुपया टूटने के बाद साइंस इंडस्ट्री के समक्ष एक और संकट खड़ा जाएगा। पहले ही साइंस इंडस्ट्री आर्थिक संकट से जूझ रही है, अब उद्यमियों को एक बड़ा फटका झेलना पड़ेगा।
-अश्वनी गोयल, पूर्व प्रोजेक्ट डायरेक्टर, दि अंबाला साइंसटिफिक इंस्ट्रूमेंट मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन-
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रुपये टूटने से विदेश से आने वाले माल की लागत तो बढ़ जाएगी। लेकिन देश और विदेशों में जो बल्क कंज्यूमर है, उनसे तो पुराने रेटों पर ही डील कांट्रेक्ट हो रखी है। उसमें वृद्धि नहीं की जा सकती। लिहाजा ये नुकसान उद्यमियों पर ही पड़ने वाला है। सरकार अगर चाहे तो इस उद्योग को अनुदान देकर उनके आर्थिक नुकसान को कम कर सकती है।
-राजीव अग्रवाल, सचिव, दि साइंस एप्रेटस मैन्युफेक्चरर एसोसिएशन