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स्वामी असीमानन्द के बरी होने के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देंगे ये शख्स

अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर Updated Wed, 22 Mar 2017 03:50 PM IST
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सैयद सरवर चिश्ती - फोटो : amar ujala
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अजमेर दरगाह में हुए बम ब्लास्ट मामले में एनआईए की विशेष अदालत के फैसले को लेकर परिवादी खादिम सैयद सरवर चिश्ती नाखुश हैं। वे इस मामले में बनाए गए मुख्य आरोपी स्वामी असीमानन्द के बरी होने के फैसले को चुनौती देने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहे हैं। एनआईए की विशेष अदालत ने 8 मार्च, 2017 को असीमानन्द को बरी कर दिया था।
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अंजुमन सैयद जादगान के पूर्व सचिव व खादिम सैयद सरवर चिश्ती ने फैसले के बाद बड़ी देग में पत्रकारों से कहा कि उन्होंने वर्ष 2007 में दरगाह में हुए बम ब्लास्ट मामले की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी। उन्होंने कहा कि फैसले से सभी खादिम समुदाय और मुस्लिम वर्ग व्यथित है। इस मामले में स्वामी असीमानन्द सहित मुख्य आरोपियों को बरी कर दिया है, जबकि वर्ष 2011 तक उनके खिलाफ सभी सबूत सामने आए थे। चिश्ती ने कहा कि सत्ता बदलते ही एनआईए की जांच की दिशा भी बदल गई।

उन्होंने कहा कि असीमानन्द का नाम अजमेर ब्लास्ट, मालेगांव ब्लास्ट व समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट में भी आ चुका है। उन्होंने कहा कि जब याकूब मेनन को आतंकवादी होने के कारण फांसी की सजा दी जा सकती है, तो फिर जिन दो आरोपियों को दोषी करार दिया गया उन्हें आजीवन कारावास की सजा से ही क्यों दंडित किया गया।
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चिश्ती ने कहा कि उक्त मामले में अंजुमन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि मोदी के सत्ता में काबिज होते ही एनआईए पर दबाव बनाया गया जिससे चार्जशीट तक बदल दी गई। चार्जशीट के आधार पर ही न्यायालय ने फैसला किया है।

जानिए, कौन हैं स्वामी असीमानन्द
अजमेर दरगाह में 2007 में हुए विस्फोट मामले में जांच एजेंसियों ने स्वामी असीमानंद को मुख्य आरोपी बनाया था। जांच एजेंसियों ने आरोप पत्र में इस ब्लास्ट में उनकी साजिशकर्त्ता के रूप में भूमिका गढ़ी थी, जिसे अदालत में साबित करने में ये एजेंसियां विफल रहीं। असीमानंद का असली नाम नभकुमार सरकार है और वे मूलत: पश्चिमी बंगाल में हुगली के रहने वाले हैं।

जांच एजेंसियों के अनुसार वे 1995 में कट्टरपंथी नेता के तौर पर पहली बार सक्रिय हुए। इस दौरान उन्होंने हिंदू संगठनों के साथ मिलकर गुजरात में हिंदू धर्म जागरण और शुद्धिकरण अभियान चलाया। उन्होंने अपनी गतिविधियां संचालित करने के लिए शबरी माता का मंदिर बनाया।

इससे पहले वे पुरुलिया में सक्रिय थे। बाद में मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र आदि में सक्रिय हो गए। वर्ष 1990 से 2007 के बीच राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ी संस्था वनवासी कल्याण आश्रम के प्रांत प्रचारक प्रमुख भी रहे है।
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