शेर की खाल
बोधिवृक्ष के नीचे
सो रहे ढोंगी
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घूरता रहा
आँगन की खूँटी से
लटका चश्मा
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सजाता रहा
इश्क की बारिशों को
हाउस बोट
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सीटी बजाते
दौड़ चले ताड़ भी
ट्रेन में हम
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