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शेर की खाल

Rajendra Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शेर की खाल
        
                                                    
                            
बोधिवृक्ष के नीचे
सो रहे ढोंगी
,,,,,,,,,,,,,,
घूरता रहा
आँगन की खूँटी से
लटका चश्मा
,,,,,,,,,,,,,,,,
सजाता रहा
इश्क की बारिशों को
हाउस बोट
,,,,,,,,,,,,,,,,
सीटी बजाते
दौड़ चले ताड़ भी
ट्रेन में हम

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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