यूं तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
दिल नज़र बन जाएगा ग़म हर ख़ुशी हो जाएगी
आप के जाते ही दुनिया दूसरी हो जाएगी
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दिल बना दोस्त तो क्या क्या न सितम उस ने किए
हम भी नादां थे निभाते रहे नादान के साथ
क्यूं इक तरफ़ निगाह जमाए हुए हो तुम
क्या राज़ है जो मुझ से छुपाए हुए हो तुम
दूर हूं लेकिन बता सकता हूं उन की बज़्म में
क्या हुआ क्या हो रहा है और क्या होने को है
दिल चीज़ क्या है दिल से मोहब्बत जताए कौन
अपना जो ख़ुद न हो उसे अपना बनाए कौन
अपनी हस्ती का भी इंसान को इरफ़ां न हुआ
ख़ाक फिर ख़ाक थी औक़ात से आगे न बढ़ी
तिरे बग़ैर अजब बज़्म-ए-दिल का आलम है
चराग़ सैंकड़ों जलते हैं रौशनी कम है
क्या ख़ुशी में ज़िंदगी का होश कम रह जाएगा
ग़म अगर मिट भी गया एहसास-ए-ग़म रह जाएगा
बदलती जा रही है दिल की दुनिया
नए दस्तूर होते जा रहे हैं