गुलज़ार को हमेशा उन गीतकारों में से एक माना जाता है जिन्होंने गहरी बातों को भी अपने आसान शब्दों में कह दिया। ऐसी ही कुछ नज़्में उनकी किताब प्लूटो से जो यूं तो आसान ही लगती हैं लेकिन जिनके मा’नी बहुत गहरे हैं।
अचानक तुमको देखा आज फ़्लाइट में
लगा तुम फिर अकेली हो
और उसके बाद ‘लॉस्ट एंड फ़ाउंड’ के
काउंटर पे भी जाते हुए देखा
उफ़्फ़…
तुम्हारी ‘कुछ भी’ खो देने की ये आदत नहीं जाती।
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और तुम ऐसे गयीं
शहर की बिजली चली जाए अचानक जैसे
और मुझको…
बन्द कमरे में बहुत देर तलक कुछ भी दिखाई न दिया
आंखें अंधेरे से मानूस हुईं तो…
फिर से दरवाज़े का ख़ाका-सा नज़र आया मुझे
आहिस्ता-आहिस्ता आख़िर पूरी बोतल ख़त्म हुई
घूंट-घूंट ये साल पिया है
तल्ख़, ज़्यादा, तेज़ाबी और आतिशीं क़तरे
होंट अभी तक जलते हैं
दोस्त शायर था मेरा…
बेतकल्लुफ़ था, किसी बात पे कह दिया मैंने
“मरने से पहले भी तुम, नज़्म कई कह के मरोगे?”
मुस्करा के मुझे देखा, कहा-
“मरने से पहले कोई नज़्म नहीं होती कभी दोस्त
मरने के बाद ही कहता हूं मैं हर नज़्म हमेशा”
चलो दरवाज़ा खोलो प्लेन का
चलो, बाहर चलें, कुछ दूर टहलें, बादलों पर
जुराबें खोलकर कुछ दूर नंगे पांव चलते हैं
चलो देखें तो जब पांव नहीं पड़ते ज़मीं पर, कैसा लगता है
साभार- प्लूटो
वाणी प्रकाशन