मीर हसन का जन्म 1727 ई. में दिल्ली में हुआ। मीर के वालिद मीर ज़ाहिक भी शायर थे। मीर हसन ने प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही रहकर अपने वालिद से ली। शे’र-ओ-शायरी का शौक़ लड़कपन से था, वो ख़्वाजा मीर दर्द की संगत में रहने लगे और वही शायरी में उनके पहले उस्ताद थे। ख़ासे रंगीन मिज़ाज और हुस्नपरस्त शायर थे मीर हसन। पेश है मीर के चुनिंदा शेर...
सदा ऐश दौराँ दिखाता नहीं
गया वक़्त फिर हाथ आता नहीं
दोस्ती किस से न थी किस से मुझे प्यार न था
जब बुरे वक़्त पे देखा तो कोई यार न था
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और कुछ तोहफ़ा न था जो लाते हम तेरे नियाज़
एक दो आँसू थे आँखों में सो भर लाएँ हैं हम
आसाँ न समझियो तुम नख़वत से पाक होना
इक उम्र खो के हम ने सीखा है ख़ाक होना
इतने आँसू तो न थे दीदा-ए-तर के आगे
अब तो पानी ही भरा रहता है घर के आगे
इज़हार-ए-ख़मोशी में है सौ तरह की फ़रियाद
ज़ाहिर का ये पर्दा है कि मैं कुछ नहीं कहता
क्यूँ इन दिनों 'हसन' तू इतना झटक गया है
ज़ालिम कहीं तिरा दिल क्या फिर अटक गया है
मैं ने जो कहा मुझ पे क्या क्या न सितम गुज़रा
बोला कि अबे तेरा रोते ही जनम गुज़रा
हम को भी दुश्मनी से तिरे काम कुछ नहीं
तुझ को अगर हमारे नहीं प्यार से ग़रज़
हम न निकहत हैं न गुल हैं जो महकते जावें
आग की तरह जिधर जावें दहकते जावें
हम न हँसते हैं और न रोते हैं
उम्र हैरत में अपनी खोते हैं
मुँह कहाँ ये कि कहूँ जाइए और सो रहिए
ख़ूब गर नींद है तो आइए और सो रहिए
साथ देखूँ हूँ किसी के जो किसी दिलबर को
मैं भी जी रखता हूँ मुझ को भी हवस आती है
मजनूँ को अपनी लैला का महमिल अज़ीज़ है
तू दिल में है हमारे हमें दिल अज़ीज़ है
बस दिल का ग़ुबार धो चुके हम
रोना था जो कुछ सो रो चुके हम
तुम ख़्वाब में भी न आए फिर हाए
क्या ख़्वाब में उम्र खो चुके हम