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सियासत पर कहे शेर

दीपाली अग्रवाल

Kavya Charcha
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नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है
- राहत इंदौरी

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कैसे कैसे हैं रहबर हमारे
कभी इस किनारे, कभी उस किनारे
-'राज' इलाहाबादी

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
- बशीर बद्र

सियासत खेल है जादूगरी का
तमाशाई बनाया है किसी ने
- जावेद सिद्दीक़ी आज़मी
6 वर्ष पहले
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