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कुँअर अरुण

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बढ़ाकर हमसे ताल्लुकात देख लेना
        
                                                    
                            
हमसे कभी हमारी बात देख लेना
तुम भरोसा करो टूटने नहीं देगे
जोड़कर हमसे ज़ज्बात देख लेना

बड़े लहलोट है हम और लावण्य भी
करके कभी तुम मुलाकात देख लेना

क्यों चावल नहीं है पतीलें मे उसके
जारको की जाज्वल्य जात देख लेना

हौंसले क्या है परिंदों के 'कुँवर' उठा
नजरें आसमाँं की बिसात देख लेना

कुँवर अरुण


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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