देख ले जो उसे रक़्स करते हुए
रात कटनी है करवट बदलते हुए
देखकर ज़ख्म तूने कहा कुछ नहीं
ज़ख्म तबसे ये मेरे हरे से हुए
वो तरन्नुम में कोई ग़ज़ल पढ़ दे तो
लोग रोने लगें दाद देते हुए
रूह को इस कदर छू गए तुम मिरे
त्याग कर सारी परतें इकहरे हुए
संग ही संग कमरा पिघलने लगा
हम बदन से बदन को थे ढाँपे हुए
सैकडों मील से चल पड़ा कामगार
इक सदी को ही काँधे पे लादे हुए
वो मुसव्विर फ़क़त इसलिए है बना
बन ही जाएगा तुझको बनाते हुए
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