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ग़ज़ल

अमित कुमार

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            देख ले जो उसे रक़्स करते हुए
        
                                                    
                            
रात कटनी है करवट बदलते हुए

देखकर ज़ख्म तूने कहा कुछ नहीं
ज़ख्म तबसे ये मेरे हरे से हुए

वो तरन्नुम में कोई ग़ज़ल पढ़ दे तो
लोग रोने लगें दाद देते हुए

रूह को इस कदर छू गए तुम मिरे
त्याग कर सारी परतें इकहरे हुए

संग ही संग कमरा पिघलने लगा
हम बदन से बदन को थे ढाँपे हुए

सैकडों मील से चल पड़ा कामगार
इक सदी को ही काँधे पे लादे हुए

वो मुसव्विर फ़क़त इसलिए है बना
बन ही जाएगा तुझको बनाते हुए


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