माता पृथ्वी को किया, मनुजों ने संतप्त।
भोगे दुःख मनुष्यता, अब होकर अभिशप्त।
अब होकर अभिशप्त, रोग की मिले न औषधि।
ना निदान उपचार, सिद्धि की कोई भी विधि।
जैसे बोए बीज, वही फल मानव पाता।
अब भी करें सुधार , क्षमा कर देगी माता।
अच्युतम केशवम एटा
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