मौन रहता हूँ
मैं अब मौन रहता हूँ
तेरे चले जाने के बाद
ऐसा नहीं है कि
मुझे अब कुछ भी
बोलना पसन्द नहीं है
मुझे पसंद तो आज भी है
तुमसे घंटों बात करना
तेरे संग राहों में चलते जाना
दूर तक चल के खो जाना
नदी किनारों पर बैठे रहना
तुम्हारे साथ आलिंगनबद्ध हो जाना
मुझे आज भी पसंद है
तेरे मुस्कान पे दीवाना हो जाना
तेरे गम में बैठ के साथ रोना
तेरे दिए तोहफों को संभाले रखना
तेरे हर जिद को पूरा करना
तेरे बातों को बहुत देर तक सोंचते रहना
और फिर तुम्हारे साथ
अपने लक्ष्यों की ओर निकल जाना
मुझे आज भी पसंद है
लेकिन अब मैं
मौन रहता हूँ
क्योंकि सुनने के लिए तुम नहीं हो
सलाह के लिए तुम्हारा साथ नहीं है
सोने के लिए तुम्हारा गोद नहीं है
रोने के लिए तुम्हारा कंधा नहीं है
तेरी मुस्कान बस तस्वीरों तक
सिमट कर रह गई है
तेरा हमसफर तेरे बिन
अब अकेले चलना नहीं चाहता
लेकिन चलता हूँ मैं तो बस
अपने लक्ष्य को पाने के लिए
क्योंकि अब मेरे पास तुम नहीं हो
सचमुच मौन हो गया हूँ
मैं भी तेरे जाने के बाद
अकेला सा हो गया हूँ
तेरे दुनियां से जाने के बाद
खुद को कैद कर लिया है
एक छोटे से कमरे में
जहाँ पर अब सिर्फ मैं हूँ
मेरी किताबें है और
है बस तेरी यादें।
-- नृपेन्द्र अभिषेक नृप
जनता बाजार , छपरा , बिहार
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