कभी कभी स्वयं का खून बहाना बड़ी बात होती है साहब,
लोग तो यूं ही दूसरों का खून बहाते रहते हैं,
और स्वयं के पसीने से नहाने से भी बड़ी बात होती है साहब,
लोग तो दूसरों के पसीने की नदियां बहा देते हैं,
हम तो यूं ही बैठे-बैठे सोचते रहते हैं साहब,
कुछ लोग तो सोचने में सदिया बिता देते हैं,
दूसरों के घरों में आग लगाना कितना आसान है सर जी,
पर खुद के घर में लगी आग को बुझाने के बारे में क्या ख्याल है आपका,
मेरा कहना यह था सर जी, की लोग दूसरों के कष्ट आसानी से बन जाते हैं,
पर दूसरे के कष्टों को दूर करने के बारे में क्या ख्याल है आपका,
अरे साहब आप तो लोगों से आशा लगाए बैठे हैं,
पर जो आपसे से आशा लगाए बैठे हैं उनके बारे में क्या ख्याल है आपका ।।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें