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ओ हो साहब

पथिक अंजान

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी कभी स्वयं का खून बहाना बड़ी बात होती है साहब,
        
                                                    
                            
लोग तो यूं ही दूसरों का खून बहाते रहते हैं,
और स्वयं के पसीने से नहाने से भी बड़ी बात होती है साहब,
लोग तो दूसरों के पसीने की नदियां बहा देते हैं,
हम तो यूं ही बैठे-बैठे सोचते रहते हैं साहब,
कुछ लोग तो सोचने में सदिया बिता देते हैं,
दूसरों के घरों में आग लगाना कितना आसान है सर जी,
पर खुद के घर में लगी आग को बुझाने के बारे में क्या ख्याल है आपका,
मेरा कहना यह था सर जी, की लोग दूसरों के कष्ट आसानी से बन जाते हैं,
पर दूसरे के कष्टों को दूर करने के बारे में क्या ख्याल है आपका,
अरे साहब आप तो लोगों से आशा लगाए बैठे हैं,
पर जो आपसे से आशा लगाए बैठे हैं उनके बारे में क्या ख्याल है आपका ।।


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6 वर्ष पहले
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