हाथ जोड़कर शीश नमन देव मुनि-जन को मेरा
प्रयागराज में कुंभ चल रहा चलकर जमाएं डेरा
दर्शन पाने को भक्त लगाते हैं, दुनिया भर में फेरा
प्रयागराज में आए बसे, फिर भी मर्म न जाने तेरा
गंगा मइया के तट पर, बह चली भक्ति रसधार
जो आकर संगम नहाएं, उसका हो जाए उद्धार
चलें भक्त गंगा के तीर, तुलसी प्रेम राम अधीन
हे देव मुझसे लें काम-क्रोध, मद-मोह सब छीन
गंगा यमुना सरस्वती मिली, संगम रुप हैं लीन
आस्था-विश्वास से रहे, सदा संगम पाप विहीन
-प. अमरेश कुमार उपाध्याय
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