सूरज उगने लगा रोटी को तलाशने शहर को चल पड़ा
देखता हूं रास्ते में एक वयोवृद्ध था भूखा-प्यासा पड़ा
यह देख कर जेहन में कई सवाल उठने लगे
धीमे-धीमे से पास आते कदम ठिठकने लगे
सुना था शहर में लोग थाल में रोटी छोड़ देते हैं
होटल के मालिक जिसे कूड़ेदान में फेंक देते हैं
इसे विडंबना समझूं या शहरवासियों की संस्कृति
कैसे आधुनिक सभ्यता की बन गई है सभ्य नीति
उठा लिया हूं गोद में पिता समान वयोवृद्ध को
धड़कनों ने महसूस किया रोटी की तलाश को
वक्त के साथ-साथ सूरज भी ढलने लगा
चिपक कर कलेजे से वयोवृद्ध रोने लगा
आंसुओं को रोकते हुए मैं घर को वापस चल पड़ा
सुंदर पकवान से अच्छा रोटी का एक टुकड़ा बड़ा
जो भर सकता है किसी इंसान के भूखे पेट को
जहां देखना नही है खाली या भरी हुई जेब को
कवि- पं. अमरेश उपाध्याय
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