।। लोकतंत्र का दर्द ।।
#नित_चिंतन_में_है_लोकतंत्र
नित चिंतन में है लोकतंत्र
कब तक मेरा भक्षण होगा,
पूज्य जो था मैं कभी क्या
फिर से वो स्नेह दर्शन होगा!
कर रहें है मेरा जो भक्षण
असुरों का कब दर्पण होगा,
लज्जा आ रही अब मुझे की
ना अब वो समर्पण होगा!
वो प्यार नही सम्मान नही
दिन पे दिन मेरा भर्जन होगा,
जो था कभी हाथों का कंगन
अब वो टूटा दर्पण होगा!
शीश चढ़ा था जो कभी
क्या फिर से वही समपर्ण होगा,
निज चिंतन में है लोकतंत्र
कब बन्द मेरा ये घर्षण होगा!
लोकतंत्र फिर से कब
सबकी ख़ुशियों का दर्पण होगा,
ना भर्जन न भक्षण था
कुछ ऐसा क्या फिर समर्थन होगा!
लोकतंत्र क्या फिर बनेगा सिरमौर
या टूटा दर्पण होगा
नित चिंतन में है लोकतंत्र
कब तक मेरा भक्षण होगा!
करेंगे सब मिलके विकास
दो बर्तन में ना टन टन होगा,
क्या फिर से बनेगा लोकतंत्र
जो सबका धड़कन होगा !
क्या टूटे दर्पण से फिर वो
हाथों का कंगन होगा,
नित चिंतन में है लोकतंत्र
क्या फिर वो स्नेह दर्शन होगा!
आनन्द किशोर की कलम से
© आनन्द किशोर
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