नीम पर पड़े झूले श्रावण
और वह नीम का पेड़ अंदर से
खोखला था जिसमें कुछ पत्थर की
पिंडलिया निकली, उसे सिन्दूर से
लपेटकर विजयासेन,कैलारस वाली
देवी के नाम से हम आज तक पूजते आये हैे।
वर्षो से देख रहा हूं यह सिलसिला
वह नीम इसलिए याद है
कि मैं उस पर सहज ही चढ़कर खेला करता
श्रावण के महीने में निवोरी आने का
इंतजार करता और निवोरी की दुकान लगाकर
निवोरी के बदले निवोरी बेचकर सुख् पाता
ऐसे समय में ही वह नीम जिस पर
रस्सी का झूला पड़ता और श्रावण से
भादों तक एक महीने उस झूले को
चैन नहीं होता, क्योंकि तब झूलने के लिये
एक मेरा ही परिवार नहीं, पूरे मोहल्ले की
बहन-बेटियां हुआ करती थीं जो श्रावण गीत
कच्ची नीम की निवोरी, सावन जल्दी अईयेरे
गाकर देर रात तक गाती और झूलती।
तब उनके झूलने में एक जुनून हुआ करता था
श्रावण और भादों की मूसलाधार बारिस होती
तब नीम के झूले पर बरसात में भीगती
मोहल्ले की बहन-बंटिया, झूले को तेज चलाकर
श्रावण गीत को मंद स्वर से उच्च स्वर में
गुंजायमान करती, जिसके स्वर दूर कहीं
मोहल्ले-खेत खलियान तक पहुंचते तब
बुजुर्गो का अनुभव बता देता कि मोहल्ले की
किस नीम पर पडे किस झूले पर यह गीत
चल रहा है, मैं तब बचपन में इन बातें से
विस्मय में भर जाता, और उनके अनुभव की
परीक्षा लेकर खुद को हारा हुआ महसूस करता
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