बात करने को मुझसे ढूंढने बहाने लगे हैं
सारा कार्य छोड़ मुझसे बतियाने लगे हैं।।
तन्हाई में अब तो वो ग़ज़ल को हमारी
अपने हसीन लबों से गुनगुनाने लगे हैं।।
दिन रात जागते उठते मेरी तरक्की के
हर जगह एक ख्वाब सजाने लगे हैं।।
लगने हर लहजे यारों अब उनको मेरे
इक खास से बिछड़े अफसाने लगे हैं।।
नींद गायब है उनकी रातों की अब तो
लगता ऐसे बनने वो मेरे दिवाने लगे हैं।।
अब तलक लड़ते थे हम दुश्मन बनकर
अब वह बड़े प्यार से हमें बुलाने लगे हैं।।
जो खार खाते थे हमें देख सामने अपने
क्या खाया आज उसने, वे बताने लगे हैं।।
बात मानता न हूं जब मैं उनकी कोई तो
मुझपर वह अपना हक सा जताने लगे हैं।।
जो फाड़ देते थे कापी एक दूसरे की हम
तीरथ वही अब मुझे नकल कराने लगे हैं।।
- आशुतोष मिश्र
तीरथ सकतपुर
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