सस्मित विहान मृदुल प्रभंजन हुलसित काया
विहग कलरव नद कल कल मन भाया।
आस बिछाये कंज नयन आया वह आया
ट्रिन-ट्रिन रव गुंजित संग अमर उजाला लाया।
तृषित मन अब टटोले खबरों में कागज समाया
देश-प्रदेश-हास्य-व्यंग युवा प्रकृति सम-छाया।
भये प्रभात दिनमान पिछड़े तद्गल बुद्धि दौड़ाया।
पेखि संपादकीय निष्पक्ष समाचार उझकि-उझकि कर लपकाया।।
स्वरचित एवं अप्रकाशित उपर्युक्त पंक्ति "अमर उजाला" को सादर समर्पित करता हूँ। धन्यवाद।।
रचनाकार- संतोष सिंह क्षात्र
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