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हम-तुम

Abha Chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़िन्दगी की भीड़ में हैं गुमशुदा हम तुम,
        
                                                    
                            
ना जाने क्यों एक दूजे से हैं खफा हम तुम
कभी था इरादा ताउम्र साथ चलने का,
फिर आज क्यों है इतने जुदा हम तुम।।

फलक पर चाँद भी आजकल उदास रहता है,
कब तक बने रहेगे यूँ बेजबां हम तुम
अब तो आने लगीं सदाएं उन दरख्तों से,
जिनके नीचे कभी लिए थे पनाह हम तुम।।

कल राह मे मिली गलियो ने मुझको रोक लिया,
जिनकी सरगोशी में हुए थे जवां हम तुम
मुझसे कहती हुई हवा थम सी गयी,
क्या यूं ही निभायेंगे वफा हम तुम।।

खुशियों की तलाश में भटक कर देख लिया,
दूर रहकर है कितने गमजदा हम तुम।
कहते कहते कहीं बहुत देर न हो जाये,
बन जाये न एक दूजे के लिए बेवफा हम तुम।।

- आभा चन्द्रा

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