मैंने तुम्हें तुम्हारे चेहरे के पार देखा है,
जिसमे अनगिनत सुंदरताए झरती है,
मिलना चाहोगी तुम, खुद से, मेरी नज़र से...
तुम मेरे कल्पनाओं की उस ओंस की बूंद की तरह हो,
जो मोती समान चमकती है,
तुम पेड़ पर बैठी कोयल हो,
जो मीठे गीत सुनाती है,
तुम उस फूल की तरह हो,
जिस पर असंख्य भंवरे सम्मोहित है,
तुम मां की आंचल की तरह हो,
जिससे लिपट कर हर सुख मिलता है,
तुम पिता की वो डांट हो,
जो जिंदगी का ककहरा सिखाता है,
तुम भाई का प्यार हो, बहन का दुलार हो,
तुम जीवनसंगिनी की तरह हो,
जो प्रेमिका बन रिझाती है,
तुम कोई दोस्त हो ,
जो सुख दुःख में एक साथ है,
असल में तुम प्रकृति हो ,
जो कुछ मांगती नहीं हमेशा देती है,
हां मैने तुम्हें हर झरोखें से बार बार देखा है,
जिसमे अनगिनत विविधताएं मिलती है,
क्या मिलना चाहोगी तुम, खुद से ?
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