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मन "जीवन"

Abhishek Gaur

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मिट्टी के उन पुतलों को नमन जो उम्मीद का ढांढस बंधाते हैं
        
                                                    
                            
मिट्टी के उन पुतलों को नमन जो उम्मीद का ढांढस बंधाते हैं
वरना कलयुग में कहाँ प्रभु आते हैं
विचारों पर ही आधारित है देव और दैत्यों का प्राकृत्य
मन में बसे हों राम तो रावण नज़र नही आते
और मन में आ जाए रावण तो राम भी ओझल हो जाते हैं
निर्भर है आपकी मानसिकता पर सब कुछ
वरना पत्थर कहाँ पूजे जाते है
ये पूजे जाते हैं जब ईश्वर आपके मन को नज़र आते हैं
मिट्टी के उन पुतलों को नमन जो उम्मीद का ढांढस बंधाते हैं
वरना कलयुग में कहाँ प्रभु आते हैं

- अभिषेक गौड़

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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