आदमी भी क्या अनोखा जीव है
काम करके थक गया था
चाहता आराम था
मगर जब आराम मिला तो
बहार जाने का क्या काम था
नाम दौलत सोहरत क्या क्या कमाया
बस इन्हीं चाहतों में क्या क्या गंवाया
आज जब आराम से पिता खेलता है पुत्र के संग
तो उसी नन्हें परिंदे में है पाता सब इंद्रधनुषी रंग
सोचता है कि कितना खो चुका था जिंदगी में
शान ओर सौकत में नहीं, पर जो मजा है सादगी में
संकट के इस दौर में खुद से मिला है आदमी
तो अकेले बैठकर कुछ सोचना है लाजमी
आथिर्क मूल्यों के संग संग कुछ नैतिक मूल्य चुकाने होंगे
वरना लौट लौट कर मानव तेरे मूंह पर कुदरत के कुछ ताने होंगे
सीना तान चला जाता है
अपनीं धौंस दिखाने को
पल भर भी न लगेगा मानव,
मुझको (प्रकृति को) हस्ती तेरी मिटाने में
आज तू फिर वक्त की जंजीरों में जकड़ा गया है
तेरा बूढ़ा बाप आकर पत्र एक पकड़ा गया है
खोलकर पढ़ देख उसमें क्या लिखा है
बेटा मुझको अब वृद्धाश्रम न भेजना
बड़ी मुद्दतों के बाद तेरा ये चेहरा दिखा है
मतलबी दुनिया के रंग में आदमी है खो गया सा
स्वार्थ के रिस्तों के आगे खून के रिस्ते भूल गया था
कठिन दौर है कट जायेगा
अंधकार भी छट जायेगा
आयेगी फिर भोर सुहानी
दौडेगी पटरी पे जवानी
अबकी भूल न दोहरायें हम
मानव बन मानवता दिखलायें हम
- अभिषेक मिश्रा
#21 दिन लाॅकडाउन के
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