कैसे समझ लूँ पूरी दुनिया
भागता इन्सान और अकेला मैं
बदलती दुनिया बदलते लोग
दुख दर्द खुशियां खुश़बू रंग
जलती पृथ्वी छटपटाता इंसान
तबाह परेशान मौत ही इलाज
दौड़ता थकता कभी गिरता
कब चपेट में आ जाए कुछ पता नहीं
ये आधुनिकता अजीबो-गरीब व्यवहार
पागल होकर करता नरसंहार।।
कुछ कर गुज़रने की चाह फिर आह !
पूरे ख्वाब अधूरा ख्वाब
शांति ढूंढता मगर मिलती नहीं
बस चिन्ता चिता और कब्रिस्तान।।
कहीं खोया गुमसुम कोई सुध ही नहीं
और अन्त फिर मौत का रिश्तेदार
बहस-बात फिर अचानक टकरार
कटता लहू से सना तरबतर इन्सान।।
मोहब्बत के पीछे मन में छुपी स्वार्थ
मतलबी, ईर्ष्या, नफरतों की चादर लपेटे
भटकता ठोकरें खाता इस्तेमाल होता इन्सान।।
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