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आधुनिक इंसान...

Adeeb Mohsin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कैसे समझ लूँ पूरी दुनिया 
        
                                                    
                            
भागता इन्सान और अकेला मैं
बदलती दुनिया बदलते लोग
दुख दर्द खुशियां खुश़बू रंग
जलती पृथ्वी छटपटाता इंसान
तबाह परेशान मौत ही इलाज
दौड़ता थकता कभी गिरता
कब चपेट में आ जाए कुछ पता नहीं
ये आधुनिकता अजीबो-गरीब व्यवहार
पागल होकर करता नरसंहार।।
कुछ कर गुज़रने की चाह फिर आह !
पूरे ख्वाब अधूरा ख्वाब
शांति ढूंढता मगर मिलती नहीं
बस चिन्ता चिता और कब्रिस्तान।।
कहीं खोया गुमसुम कोई सुध ही नहीं
और अन्त फिर मौत का रिश्तेदार
बहस-बात फिर अचानक टकरार
कटता लहू से सना तरबतर इन्सान।।
मोहब्बत के पीछे मन में छुपी स्वार्थ
मतलबी, ईर्ष्या, नफरतों की चादर लपेटे
भटकता ठोकरें खाता इस्तेमाल होता इन्सान।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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