क्यों यूँ ही दूँ घुटने मैं अपने टेक?
क्या मैं भी जैसे मिलें कई अनेक?
ये दुःख अवसर है दौड़ में थम कर
हट भीड़ से कर विचार कुछ ठहर।
सीमा में अपने कष्ट करने को
क्यों न ले प्रेरणा इस आह से अपनी
पीड़ा किसी की सीमित कर दूँ?
सेवा किसी व्यथित की मैं कर दूँ?
कृपा अपने संताप पर पाने को
क्यों न निर्मल आंसुओं से अपने
हृदय किसी का पुष्पित कर दूँ?
निर्बल किसी को पोषित मैं कर दूँ?
करुणा अपनी यंत्रणा पर पाने को
क्यों न चिंता की रेखाओं से अपनी
भाग्य किसी का इंगित कर दूँ?
जीवन किसी का फलित मैं कर दूँ?
नियत पूर्ण यातना अपनी करने को
क्यों न पीर से अपने अंतर की
मार्ग किसी का प्रमुदित कर दूँ?
घाव किसी अपरिचित के मैं भर दूँ?
उठूँ ! यूँ उलझ वेदना के धागों में
होगा न कुछ भी डूब अवसादों में।
ऋजु सुख भोग लिया है रोम रोम
तरूँ हँस अब उसका चक्र विलोम।
- अजेय जुगरान