खड्डेवाले स्कूल से ज़्यादा दूर नहीं था मौसी का घर
समय-असमय यूँ ही चला जाता था मैं मौसी के घर ।
कभी अकेले, कभी भाई दुकेले, कभी भाई बहन तिकेले
हमेशा हंस प्यार के बैठा वो लाती बगिया से भुट्टे-केले ।
उनसे बड़ी आँखोंवाली लेकिन माँ सी ही प्यारी थी मौसी
कभी बिन प्यार से खिला पिला जाने नहीं देती थी मौसी ।
उसकी उड़द दाल भरी रोटी आम का अचार याद आते हैं
उसकी ग्लास भर अदरक चाय नींबू पानी याद आते हैं ।
हमेशा कहती थी मुझे अज्जू- दीदी का छोटा भतीजा
हालाँकि मेरा था उससे सीधा इक अपना ही रिश्ता ।
कभी समझ नहीं आया बचपन में माँ का यह कहना
बेटा देखो तुम इन्दू को जा जाकर परेशान न करना ।
लेकिन फिर भी याद कर माँ की बात मैं जब सकुचाता
दुर्गा मुझे बार बार चल चल कह फिर से घर ले जाता ।
अर्चू -मुक्की तो हमसे भी छोटे थे पर सेवादार बड़े थे
मौसा जी कुशल पूछ चुप, वो हुक्के के पक्के बड़े थे ।
जब बड़े हुए तो जीवन सत्य देख माँ का कहां समझ में आया
मौसी के घर में साधन कम थे लेकिन उसने ख़ुद न ये कभी बतलाया ।
उसका दिल सागर था, सदा सबको आओ आओ कहकर अपने पास बुलाती
धुल धुल हुई मुलायम धोती में, बड़ी लाल बिंदी ले माथे पर, सदा सबको गले लगाती ।
मौसी मेरे जीवन का - इक बहुत ही प्यारा- प्यारा हिस्सा है
यह कविता उसके बड़े प्यार का- इक बहुत ही छोटा सा क़िस्सा है।
- अजेय जुगरान