एक मृग
कुछ खोया, कुछ रोया-सा लग रहा था
न जाने
क्यों?
वातावरण दुःख से सज रहा था
डर उसका
कुछ घबराहट-सी दे रहा था
न जाने वो क्यों सियार बन रहा था।
आंखें उसकी नम हो रही थी
संसार उसको जम लग रहा था
सब कुछ सह रहा था
बस मन ही मन कुछ कह था था
" क्यों तोड़ दिया आवास मेरा ,
क्यों बिखेर दिया परिवार मेरा,
हे! दुष्ट प्राणी
चेतावनी समझ ले
क्या मेरा आवास तोड़कर तू सुखी रह पाएगा
ना, तू जीवित ही न रह पाएगा"।
एक मृग हूं,
वाणी है मेरे पास
कुछ बोल नहीं सकता मैं
पर हा,
एक चिंगारी जिसकी जरूरत है आज
उत्पन्न कर सकता हूं मैं
अजूबा कहेगा -" छोटी सी चिंगारी से तो,
संसार जल जाएगा"।
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