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एक मृग

Akash Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक मृग
        
                                                    
                            
कुछ खोया, कुछ रोया-सा लग रहा था
न जाने
क्यों?
वातावरण दुःख से सज रहा था
डर उसका
कुछ घबराहट-सी दे रहा था
न जाने वो क्यों सियार बन रहा था।

आंखें उसकी नम हो रही थी
संसार उसको जम लग रहा था
सब कुछ सह रहा था
बस मन ही मन कुछ कह था था
" क्यों तोड़ दिया आवास मेरा ,
क्यों बिखेर दिया परिवार मेरा,
हे! दुष्ट प्राणी
चेतावनी समझ ले
क्या मेरा आवास तोड़कर तू सुखी रह पाएगा
ना, तू जीवित ही न रह पाएगा"।

एक मृग हूं,
वाणी है मेरे पास
कुछ बोल नहीं सकता मैं
पर हा,
एक चिंगारी जिसकी जरूरत है आज
उत्पन्न कर सकता हूं मैं
अजूबा कहेगा -" छोटी सी चिंगारी से तो,
संसार जल जाएगा"।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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