दर्द दिया जो अपनों ने क्या कह पाओगे।
टीस भरी जो मन में है क्या सह पाओगे।
रिश्तों की कड़वाहट को भूलोगे कैसे।
जो मीठा मीठा दर्द मिला काटोगे कैसे।
नाज़ुक है रिश्तों की डोरी यह सब सहना होगा।
खातिर अपनों की जहर भी तुमको पीना होगा।
बीती बातों को भूलो जानो अपने हैं यह।
डर समाज का मानो बंधु अपने हैं यह।
इसी द्वंद में बीत जाएगा जीवन सारा।
अपनों से न कह पाओगे दर्द पुराना।
अभी समय है अभी नहीं कुछ भी बिगड़ा है।
देखो कह दो अब जो अंदर कचौट रहा है।
आधी आबादी को न अब यह सहना होगा।
समान अधिकारों की धारा को बहना होगा।
घुट घुट कर जीने को नही समाज सहेगा।
इज्ज़त दो इज्ज़त लो का ब्यार बहेगा।