चरणों चरणोदक मिल जाए,
बस शाम सहारा मिल जाए।
दोनों हाथों को बिछाए बैठा हूं,
एहसास चरणों का मिल जाए।
न धूल धूसरित हों कंकर न चुभे,
इन हाथों का बिछौना मिल जाए
नहीं धूप लगे, तूं हवा ठंडी रहना,
यह जलन चुभन सब मिट जाए।
अश्रुओं से धोऊं इन चरणों को,
अगर एक इशारा मिल जाए।
उनकी मर्जी में मस्त रहूं सदा,
चाहे ठोकर ही मुझे मिल जाए।
कब से मैं आस लगाए बैठा हूं,
शाम आज्ञा ही कोई मिल जाए।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।