फेंक दे कसौटियों कोअपनी,
अब न और आजमाइश कर।
ज़ख्म भर रहे आहिस्ता से,
न इनकी और नुमाइश कर।
हिज़्र की रात कटी तन्हा जगते,
ज़ेरे सहर भूल जाने की न फरमाइश कर।
गहरी बहुत है दर्द की खाइयां,
उतर के गहरे और न पैमाईश कर।
मर चुका हूँ कब का कतरा कतरा,
कत्ल के मेरे रूह की अब न ख्वाहिश कर।
- अम्बर
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