अट्टहास
चुभता जगती का सत्य सघन,
कातर हृदय तब करता क्रंदन,
झरते नयनों का जब उपहास हुआ करता है,
मन तब अट्टहास किया करता है।
उदधि के तट पर मिलनातुर,
सरिता का हाहाकारी स्वर लहर,
लक्षावधी प्राणों में जब उन्माद भरा करता है,
मन तब अट्टहास किया करता है।
दिवावसान के पथ पर,
झंझावातों से लड़ थक कर,
यमपाश फंसा कर प्राणों में,यम जब परिहास किया करता है,
मन तब अट्टहास किया करता है।
अमित भारद्वाज
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