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अट्टहास

Amit Bhardwaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अट्टहास
        
                                                    
                            
चुभता जगती का सत्य सघन,
कातर हृदय तब करता क्रंदन,
झरते नयनों का जब उपहास हुआ करता है,
मन तब अट्टहास किया करता है।

उदधि के तट पर मिलनातुर,
सरिता का हाहाकारी स्वर लहर,
लक्षावधी प्राणों में जब उन्माद भरा करता है,
मन तब अट्टहास किया करता है।

दिवावसान के पथ पर,
झंझावातों से लड़ थक कर,
यमपाश फंसा कर प्राणों में,यम जब परिहास किया करता है,
मन तब अट्टहास किया करता है।

अमित भारद्वाज

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले
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