बहुत है भीड़ लोगों की मगर कोई अपना नहीं दिखता
अब तो ख्वाबों मैं भी कोई सुखद सपना नहीं दिखता
जो कहते है कि मेरे ये सारे दर्द गम फरेबी और झूंठे है
उन्हें शायद मेरे जवां हाथों का यूं कपना नहीं दिखता
उदासियों में यूं ही हर शाम ढलती जा रही हैं
मगर ये जिंदगी फिर भी तो चलती जा रही है
जिन्हें समझा था सहारा हमनें ही बुरे वक्तों का
अब तो उनकी भी फितरत बदलती जा रही है
और तो कौन आएगा यहां मुझे अब चुप कराने
बस मेरी तनहाई ही मेरे हाथ मलती जा रही है
मेरा अब इस जमाने से तो जी सा भर गया है
ये मेरी सांस अब मुझको ही खलती जा रही है
हे भगवन अब तू ही थोड़ा रहम कर दे वरना
अब मुझसे इतनी मुफ़लिसी सही नहीं जाती
दर्द आंखों से समझले मेरा वो सख्श भी नहीं
और दुनियां से अपनी बेबसी कही नहीं जाती
जिंदगी तेरे हर दर्द को दिल मैं छुपाए बैठे है
मौत से पहले ही हम खुद को मिटाए बैठे है
गैरों की क्या जरूरत थी हमें सताने के लिए
जब हम यहां अपनों से ही चोट खाए बैठे है
जिसे परवाह ना रही हो बुरे वक्त में भी मेरी
फिर भी हम उनको पलकों पे सजाए बैठे है
मेरे सभी अपने मुझे तन्हा छोड़कर चले गए
अब खुदा बस तुझी से उम्मीदें लगाए बैठे है
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