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हिंदी शायरी

AMIT KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहुत है भीड़ लोगों की मगर कोई अपना नहीं दिखता
        
                                                    
                            
अब तो ख्वाबों मैं भी कोई सुखद सपना नहीं दिखता
जो कहते है कि मेरे ये सारे दर्द गम फरेबी और झूंठे है
उन्हें शायद मेरे जवां हाथों का यूं कपना नहीं दिखता

उदासियों में यूं ही हर शाम ढलती जा रही हैं
मगर ये जिंदगी फिर भी तो चलती जा रही है
जिन्हें समझा था सहारा हमनें ही बुरे वक्तों का
अब तो उनकी भी फितरत बदलती जा रही है
और तो कौन आएगा यहां मुझे अब चुप कराने
बस मेरी तनहाई ही मेरे हाथ मलती जा रही है
मेरा अब इस जमाने से तो जी सा भर गया है
ये मेरी सांस अब मुझको ही खलती जा रही है

हे भगवन अब तू ही थोड़ा रहम कर दे वरना
अब मुझसे इतनी मुफ़लिसी सही नहीं जाती
दर्द आंखों से समझले मेरा वो सख्श भी नहीं
और दुनियां से अपनी बेबसी कही नहीं जाती

जिंदगी तेरे हर दर्द को दिल मैं छुपाए बैठे है
मौत से पहले ही हम खुद को मिटाए बैठे है
गैरों की क्या जरूरत थी हमें सताने के लिए
जब हम यहां अपनों से ही चोट खाए बैठे है
जिसे परवाह ना रही हो बुरे वक्त में भी मेरी
फिर भी हम उनको पलकों पे सजाए बैठे है
मेरे सभी अपने मुझे तन्हा छोड़कर चले गए
अब खुदा बस तुझी से उम्मीदें लगाए बैठे है
 
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4 वर्ष पहले
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