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जीवन के दो “शब्द”

amit kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सोच के चला आया,
        
                                                    
                            
पीछे कुछ छोड़ के चला आया।
मेहनत कर कुछ पाने चला आया,
सपनों को पूरा करने चला आया।
क़िस्मत आज़माने चला आया,
जीवन के दो “शब्द” सीखने चला आया।

कुछ कह के चला आया,
कुछ ले के चला आया।
कुछ पाने चला आया,
कुछ खोने चला आया।
कुछ कहने चला आया,
कुछ पुछने चला आया।
जीवन के दो “शब्द” सीखने चला आया।

कुछ समझने चला आया,
कुछ समझाने चला आया।
खुद को कुछ बनाने चला आया,
जीवन को दिशा देने चला आया।
दुनिया को गले लगाने चला आया,
जीवन के दो “शब्द” सीखने चला आया।

क़ैद पंछी को उड़ाने चला आया,
लोगों को क़ैदी बनाने चला आया।
अच्छाई की पहचान करने चला आया,
सपनों की उड़ान भरने चला आया।
कुछ को दोस्त बनाने चला आया,
जीवन के दो “शब्द” सीखने चला आया।

-अमित कुमार सिन्हा


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले
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