विज्ञापन

ज़िंदगी है...

Amit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़िंदगी है, हालातों का जुआखाना साकी
        
                                                    
                            
है वक्त, खुशी और ग़म का जनाना साकी

चिरांद आता है मेरे जलाए चिरांगा से
खुशियों से क्यू जलता है ज़माना साकी।

मिरे टहनी के हिस्से दरकने लगे हैं
कम हुआ है अब, चिट्ठियों का आना साकी।

अपराध इतना था कि इश्क़ किया था मैंने
जुदाई में अब हाल है फकीराना साकी।

अब एक ही दर है बचा, मुझे संभालने को
डरता हूँ कही रूठ न जाए मयखाना साकी।

कानूनन क्या सजा होगी इस दीवाने की
हालात अब 'अमित' के है गरीबाना साकी।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all