भोर के धुंधलके में
कुछ जन बिस्तर छोड़ देते हैं
समेटते हैं जाल
और निकल पड़ते हैं नदी की ओर
एक नई उम्मीद लेकर
नदी किनारे पहुंचते ही
मन ही मन नमन करते हैं नदी को
और आज्ञा मांगते हैं
जाल फेंकने के लिए
जाल को बाहों का सहारा ले
फेंकते हैं नदी में
और फिर समेटते हैं धीरे-धीरे
मानो जीवन भर की कमाई
आ रहा हो बस कुछ ही पल में
जैसे-जैसे समेटते हैं
उम्मीद और गहरा होता जाता है
फिर जाल को
पानी से बाहर लाकर
बड़े ध्यान से देखते हैं
जाल को और
जाल में फंसी मछलियों को
और एक-एक करके
अपने थैले में रखते जाते हैं
कभी-कभी जाल में
एक भी मछली नहीं होती है
टूटता है उम्मीद
फिर भी अगली बार
उम्मीद के साथ जाल फेंकने का क्रम
बार बार चलता रहता है
द ओल्ड मैन एंड द सी के
सेंटियागो की तरह
बार-बार जाने का साहस
जुटाते हैं
और यह यात्रा
अनवरत चलता रहता है
नदी,जन और जीवन के बीच ।
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