मइया हमरी डोरा जैसी लेकिन काम डरे।
मइया की हमरी चर्चा होती है घरे घरे।।
सानी पानी गाय बछरुअन को भोरे देती हैं।
दादी संग भोरहरी गातीं देव निहोरे देतीं हैं।।
बाल बुतुरुआ देखे ताके खटियन परे परे।
मइया की हमरी चर्चा होती है घरे घरे।।
कम खातीं हैं ग़म खाती हैं गुस्सा पीती हैं।
चाची हमरी कहती हैं वो कैसे जीती हैं।।
संझवत बारें लक्ष्मी पुकारें रामा कृष्णा हरे।
मइया की हमरी चर्चा होती है घरे घरे।।
सासू ससुर जेठ जेठानी से ऊंचा ना बोलें।
पल्लू राखि हमेशा माथे तब दरवाजा खोलें।।
झमड़ा गमला बाग़ फूले पानी ढुलक ढरे।
मइया की हमरी चर्चा होती है घरे घरे।।
दूर दवाई करें मनाही हरदम रोग छिपावें।
काढा पीयें मरीच चबायें वैदा को धमकावें।।
कभी नींम शीशम तुलसी पत्ते से रोग टरे।
मइया की हमरी चर्चा होती है घरे घरे।।
चौका चूल्हा चमके भोजन अमृत सा बनावें।
ठाकुर जी की सेवा तुलसीवन दीप जरावें।।
भोग लगावें पितर मनावें अनिल चरन पकरे।
मइया की हमरी चर्चा होती है घरे घरे।।
- पंडित अनिल
अहमदनगर महाराष्ट्र